बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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१७२ नारदीयपुराणम्
शौचं तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमाभ्यंतरं तथा । मृज्जलाभ्यां बहिः शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथांतरम् ॥८॥
गृहीतशिश्नश्चोत्थाय शौचार्थं मृदमाहरेत् । न मूषिकादिखनितां फालोत्कृष्टां तथैव च ॥९०॥
वापीकूपतडागेभ्यो नाहरेदपि मृत्तिकाम् । शौचं कुर्यात्प्रयत्नेन समादाय शुभां मृदम् ॥९१॥
लिंगे मृदेका दातव्या तिस्रो वा मेढ्रयोर्द्वयोः । एतन्मूत्रसमुत्सर्गे शौचमाहुर्मनीषिणः ॥९२॥
एका लिंगे गुदे पंच दश वामे तथोभयोः । सप्त तिस्रः प्रदातव्याः पादयोर्मृत्तिकाः पृथक् ॥९३॥
एतच्छौचं विडुत्सर्गे गंधलेपापनुत्तये । एतच्छौचं गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥९४॥
त्रिगुणं तु वनस्थानां यतीनां तच्चतुर्गुणम् । स्वस्थाने पूर्णशौचं स्यात्पथ्यर्द्धं मुनिसत्तम ॥९५॥
आतुरे नियमो नास्ति महापादि तथैव च । गंधलेपक्षयकरं शौचं कुर्याद्विचक्षणः ॥९६॥
स्त्रीणामनुपनीतानां गंधलेपक्षयावधि । व्रतस्थानां तु सर्वेषां यतिवच्छौचमिष्यते ॥९७॥
विधवानां च विप्रेन्द्र एतदेव निगद्यते । एवं शौचं तु निर्वर्त्य पश्चादाचैः सुसमाहितः ॥९८॥
प्रागास्य उदगास्यो वाप्याचामेत्प्रयतेंद्रियः । त्रिश्चतुर्वा पिबेदापो गंधफेनादिवर्जिताः ॥९९॥
द्विमार्जयेत्कपोलं च तलेनौष्ठौ च सत्तम । तर्जन्यंगुष्ठयोगेन नासारंध्रद्वयं स्पृशेत् ॥ २००॥
अंगुष्ठानामिकाभ्यां च चक्षुः श्रोत्रे यथाक्रमम् । कनिष्ठांगुष्ठयोगेन नाभिदेशे स्पृशेद्द्विजः ॥२१॥
तलेनोरःस्थलं चैव अंगुल्यग्रैः शिरः स्पृशेत् । तलेन चांगुलाग्रैर्वा स्पृशेदंसौ विचक्षणः ॥२२॥
एवमाचम्य विप्रेन्द्र शुद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् । दंतकाष्ठं ततः खादेत्सत्वचं शस्तवृक्षजम् ॥२३॥
होते हैं ॥४-८॥ शौच दो प्रकार का होता है, शारीरिक और मानसिक । मिट्टी और जल से शरीर की और
भावनाओं द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि होती है। मूत्रेन्द्रिय को हाथ से पकड़कर उठे और शुद्धि के लिए मिट्टी
लावे। चूहों के बिल की मिट्टी, फाल से जोती हुई, बावली, कुँआ और तालाब से मिट्टी न ले। अच्छी मिट्टी
लेकर यत्नपूर्वक शुद्धि करनी चाहिए। मूत्रेन्द्रिय में एक बार दोनों अण्डकोषों में तीन बार मिट्टी लगानी
चाहिए। मनीषी मूत्र त्याग के समय यही शुद्धि बतलाते हैं ॥९-१२॥
जननेन्द्रिय में एक बार, गुदा में पाँच, बायें हाथ में दश, दोनों हाथों में सात और पैरों में तीन बार मिट्टी
लगानी चाहिए। मलत्याग करने पर दुर्गन्ध मिटाने के लिए इस प्रकार शुद्धि के नियम हैं। गृहस्थों के लिए
शुद्धता के ये नियम हैं परन्तु ब्रह्मचारी के दुगुना परिमाण बताया गया है। वानप्रस्थ के लिए तीन गुना और
संन्यासियों के लिए चौगुना कहा गया है ॥१३-१४३॥ अपने घर पर तो इसका पालन पूर्ण रूप से होना चाहिए,
परन्तु मार्ग में इसका आधा और रोग अथवा आपत्ति के समय इस पर विशेष विचार नहीं रखा जाता। स्त्रियों और
उपनयन से रहितों को दुर्गन्ध मिटने तक मिट्टी लगानी चाहिए। व्रतपालन के समय प्रत्येक को यति के समान
शौच के नियमों का पालन करना चाहिए। विप्रेन्द्र ! विधवाओं के लिए भी यही नियम कहे गये हैं। इस प्रकार पवित्र
हो जाने के बाद भली भाँति संयम पूर्वक पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर तीन बार या चार बार कुल्ली करे।
कुल्ली करने या पीने का जल गंध तथा फेन से रहित होना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ ! दो बार कपोलों को धोना
चाहिए और हथेली से ओठों को, तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर दोनों नासा छिद्रों को छूना चाहिए ॥१५-२०॥
अंगूठा और अनामिका से आँख और कान को क्रमशः स्पर्श करना चाहिए। द्विज कनिष्ठा और अंगूठे को मिला-
कर नाभि का स्पर्श करे। हथेली से छाती और अंगुलियों से शिर का स्पर्श करे। विद्वान् मनुष्य हथेली से या
अंगुलियों के अग्र भाग से दोनों कंधों को छुवे। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार आचमन करने से अत्यन्त शुद्धि प्राप्त
होती है ॥२१-२२३॥
इसके अनन्तर वल्कल के सहित किसी उत्तम वृक्ष की दातौन करनी चाहिए । बिल्व, असन वृक्ष, अपामार्ग