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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 187

षड्विंशोऽध्यायः
सनक उवाच
वेदग्रहणपर्यन्तं शुश्रूषानियतो गुरोः। अनुज्ञातस्ततस्तेन कुर्यादग्निपरिग्रहम् ॥१॥
वेदांश्च धर्मशास्त्राणि वेदाङ्गान्यपि च द्विजः। अधीत्य गुरवे दत्त्वा दक्षिणां संविशेदगृहम् ॥२॥
रूपलावण्यसंपन्नां सगुणां सुकुलोद्भवाम् । द्विजः समुद्वहेत्कन्यां सुशीलां धर्मचारिणीम् ॥३॥
मातृतः पंचमीं धीमान्पितृतः सप्तमीं तथा । द्विजः समुद्वहेत्कन्यामन्यथा गुरुतल्पगः ॥४॥
रोगिणीं चैव वृत्ताक्षीं सरोगकुलसंभवाम् । अतिकेशामकेशां च वाचालां नोद्वहेद्बुधः ॥५॥
कोपनां वामनां चैव दीर्घदेहां विरूपिणीम् । न्यूनाधिकाङ्गीमुन्मत्तां पिशुनां नोद्वहेद्बुधः ॥६॥
स्थूलगुल्फां दीर्घजंघां तथैव पुरुषाकृतिम् । श्मश्रुव्यंजनसंयुक्तां कुब्जां चैवोद्वहेन्न च ॥७॥
वृथाहास्यमुखीं चैव सदाऽन्यगृहवासिनीम् । विवादशीलां भ्रमितां निष्ठुरां नोद्वहेद्बुधः ॥८॥
बह्वाशिनीं स्थूलदंतां स्थूलोष्ठीं घुर्घुरस्वनाम् । अतिकृष्णां रक्तवर्णां धूर्तां नैवोद्वहेद्बुधः ॥६॥
सदारोदनशीलां च पांडुराभां च कुत्सिताम् । कासश्वासादिसंयुक्तां निद्राशीलां च नोद्वहेत् ॥१०॥
अनर्थभाषिणीं चैव लोकद्वेषपरायणाम् । परापवादनिरतां तस्करां नोद्वहेद्बुधः ॥११॥
दीर्घनासां च कितवां तनूरूहविभूषिताम् । गर्वितां वकवृत्तिं च सर्वथा नोद्वहेद्बुधः ॥१२॥
बालभावादविज्ञातस्वभावामुद्वहेद्यदि । प्रगल्भां वाऽगुणां ज्ञात्वा सर्वथा तां परित्यजेत् ॥१३॥
अध्याय २६
द्विजातियों के वेदाध्ययन आदि धर्मों का निरूपण
सनक जी बोले-वेदाध्ययन काल तक ब्रह्मचारी गुरु की सेवा करे । तत्पश्चात् गुरु
की आज्ञा पाकर अग्न्याधान करे । द्विज वेद, धर्मशास्त्र और वेदांगो का अध्ययन कर गुरु की दक्षिणा
देने के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे । द्विज रूप-सौन्दर्य से युक्त, गुणी, कुलीन, सुशीला और धर्म-
चारिणी कन्या से विवाह करे। बुद्धिमान् द्विज मातृ-कुल से पाँच और पितृ-कुल से सात पीढ़ी छोड़कर ही
किसी कन्या से विवाह करे अन्यथा वह गुरु पत्नीगामी होगा ॥१-४॥ बुद्धिमान् व्यक्ति रोगी, वृत्ताक्षी (गोल
आँखों वाली) रोगी कुल में उत्पन्न, अतिकेशा, अकेशा और वाचाल कन्या से विवाह न करे। क्रोधी, बौनी, अधिक
लम्बी, कुरूप, न्यूनाधिक अंगों वाली, उन्मत्त और पिशुन कन्या से विवाह न करे। मोटे टखनों वाली, दीर्घजंघा,
पुरुष के रूप वाली, दाढ़ी मूंछ के चिह्नों से युक्त और कुबड़ी स्त्री से विवाह न करे। व्यर्थ हँसी हँसने वाली, सदा
दूसरे के घर रहने वाली, बकवादी, घर-घर घूमने वाली, और निष्ठुर कन्या से विवाह न करे ॥५-८॥ बहुत भोजन
करने वाली, स्थूलदन्त, स्थूलोष्ठी, घुर्घुर शब्द करने वाली, अत्यन्त काली, रक्तवर्णा और धूर्त स्त्री से विवाह न
करे। सदा रोती रहने वाली, पीली, कुत्सित, कास (दमा) रोग वाली, और बहुत अधिक सोने वाली से विवाह न
करे। व्यर्थ बोलने वाली, लोक से द्वेष करने वाली, दूसरों की निन्दा करने वाली और चोर कन्या से विवाह न
करे। बुधजन बड़ी नाक वाली, धूर्त, अधिक रोम वाली, गर्वीली, और बगुले के समान कपटी स्त्री से पंडित कभी
भी विवाह न करे। यदि कोई कुमारी अवस्था में उसके स्वभाव का परिचय न पाने के कारण विवाह कर ले और
बाद में वह ढीठ और गुणहीन निकले तो उसको सर्वथा छोड़ दे ॥९-१३॥