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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 182

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पञ्चविशोऽध्यायः
ऋतुकालाभिगामी च स्वदारेषु भवेत्तथा । सर्वलोकहितेप्सित्वं मंगलं प्रियवादिता ॥२८॥
अनायासो मनोहर्षस्तितिक्षा नातिमानिता । सामान्यं सर्ववर्णानां मुनिभिः परिकीर्तितम् ॥२९॥
सर्वे च मुनितां यांति स्वाश्रमोचितकर्मणा । ब्राह्मणः क्षत्रियाचारमाश्रयेदापदि द्विज ॥३०॥
क्षत्रियोऽपि च विड्वृत्तिमत्यादापदि समाश्रयेत् । नाशयेच्छूद्रवृत्ति तु अत्यापद्यपि वै द्विजः ॥३१॥
यद्याश्रयेद्विजो मूढस्तदा चांडालतां व्रजेत् । ब्राह्मणक्षत्रियविशां त्रयाणां मुनिसत्तम ॥३२॥
चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः पंचमो नोपपद्यते । ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो भिक्षुश्च सत्तम् ॥३३॥
चतुर्भिराश्रमैरैभिः साध्यते धर्म उत्तमः । विष्णुस्तुष्यति विप्रेन्द्र कर्मयोगरतात्मनः ॥३४॥
निःस्पृहाशांतमनसः स्वकर्मनिरतस्य च । ततो याति परं स्थानं यतो नावर्त्तते पुनः ॥३५॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सदाचारो नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥२४॥

पञ्चविंशोऽध्यायः
सनक उवाच
वर्णाश्रमाचारविधि प्रवक्ष्यामि विशेषतः । शृणुष्व तन्मुनिश्रेष्ठ सावधानेन चेतसा ॥१॥
यः स्वधर्मं परित्यज्य परधर्मं समाचरेत् । पाखंडः स हि विज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥२॥
गर्भाधानादिसंस्काराः कार्या मंत्रविधानतः । स्त्रीणाममंत्रतः कार्या यथाकालं यथाविधि ॥३॥
सीमंतकर्म प्रथमं चतुर्थे मासि शस्यते । षष्ठे वा सप्तमे वापि अष्टमे वापि कारयेत् ॥४॥

वैश्यों की शुश्रूषा में निरत रहे ॥२५-२७॥ अपनी स्त्री के निकट ऋतुकाल में जाय और सर्वदा लोकमंगल की
इच्छा करे । प्रिय भाषण, स्वाभाविक प्रसन्नता, तितिक्षा और निरभिमानता ये सामान्यतः सब वर्णों के कर्त्तव्य हैं ।
सब अपने वर्ण और आश्रमोचित कर्त्तव्यों के पालन के द्वारा मुनि का पद पा जाते हैं। द्विज ! आपत्ति-काल में ब्राह्मण
क्षत्रिय का कार्य कर सकता है क्षत्रिय वैश्य का । परन्तु ब्राह्मण आपत्ति काल में भी शूद्र वृत्ति न अपनावे । यदि
कोई मूढतावश द्विज ऐसा करता है तो वह चाण्डाल सा हो जाता है ॥२८-३२॥
मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के चार आश्रम कहे गये हैं, पाँचवां कोई आश्रम नहीं है ।
सज्जनों में अग्रणी ! ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ये ही चार व्रत हैं। इन चतुराश्रमों के द्वारा उत्तम
धर्म को प्राप्त किया जाता है । विप्रेन्द्र ! कर्मयोगी, निःस्पृह, शान्त चित्त और स्वकर्म निरत जनों पर ही भगवान्
प्रसन्न होते हैं । उनकी प्रसन्नता से वे उस लोक को चले जाते हैं जहाँ से पुनः लौटना नहीं होता । ॥३३-३५॥
श्री नारदीय महापुराण में सदाचार वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२४॥

अध्याय २५
सनक बोले—वर्णाश्रमाचार विधि को विशेष रूप से कह रहा हूँ, मुनिश्रेष्ठ ! उसको ध्यान पूर्वक सुनो । जो
अपने धर्म को छोड़कर दूसरे के धर्म को अपनाता है, उस व्यक्ति को सब धर्मों से बहिष्कृत पाषण्डी समझना
चाहिए । गर्भाधान आदि संस्कार मन्त्र विधि से करना चाहिए । स्त्रियों के ये संस्कार यथा समय, बिना मन्त्रोच्चा-
रण के ही विधि पूर्वक होने चाहिए । सीमन्त संस्कार चौथे महीने में श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु छठे, सातवें या