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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 157

१३८ नारदीयपुराणम्
मण्डपं कारयेद्दिव्यं चतुरस्रं सुमङ्गलम् । शोभितं पुष्पमालाभिर्वितानध्वजराजितम् ॥२३॥
बहुदीपसमाकीर्णं किङ्किणीजालशोभितम् । दर्पणैश्चामरैश्चैव कलशैश्च समावृतम् ॥२४॥
तन्मध्ये सर्वतोभद्रं पञ्चवर्णविराजितम् । जलपूर्णं ततः कुम्भं न्यसेत्तस्योपरि द्विज ॥२५॥
पिधाय कुम्भं वस्त्रेण सुसूक्ष्मेणातिशोभितम् । हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रेण वा द्विज ।
लक्ष्मीनारायणं देवं कृत्वा तस्योपरि न्यसेत् ॥२६॥
पञ्चामृतेन संस्नाप्याभ्यर्च्य गन्धादिभिः क्रमात् । भक्ष्यैर्भोज्यादिनैवेद्यैर्भक्तितः संयतेन्द्रियः ॥२७॥
जागरं च तथा कुर्यात्सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । परेऽह्नि प्रातर्विधिवत्पूर्ववद्विष्णुमर्चयेत् ॥२८॥
आचार्याय प्रदातव्या प्रतिमा दक्षिणान्विता । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या विभवे सत्यवारितम् ॥२९॥
तिलदानं प्रकुर्वीत यथाशक्त्या समाहितः । कुर्यादग्नौ च विधिवत्तिलहोमं विचक्षणः ॥३०॥
एवं कृत्वा नरः सम्यक् लक्ष्मीनारायणव्रतम् । इह भुक्त्वा महाभोगान्पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥३१॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः कुलायुतसमन्वितः । प्रयाति विष्णुभवनं योगिनामपि दुर्लभम् ॥३२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षपौर्णिमायां लक्ष्मीनारायणव्रतं
नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥
चाहिए। व्रत उद्यापन की जो विधि है उसको कह रहा हूँ सुनो। पहले चौकोर, शुभ और दिव्य मण्डप बनावे।
उसको, फूलों की माला, चंदवा और ध्वजाओं से सजावे। दीपक, किंकिणी, दर्पण, चामर और कलशों से भली
भाँति सुशोभित करे। मध्य भाग में पाँच रंगों से रंगा हुआ सर्वतोभद्र चक्र बनावे ॥२२-२४॥ द्विज ! उस
चक्र पर जल से भरा एक मंगल-कलश रख कर उसको अति सूक्ष्म वस्त्र से ढंक दे। द्विज ! सोना, चाँदी अथवा
अथवा ताँबे की लक्ष्मीनारायण की मूर्ति बनाकर उसे कलश के ऊपर रखे। संयम रखने वाला वह व्रती भक्ति
पूर्वक पंचामृत से भगवान् को नहलाकर गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि नाना मधुर भोज्य पदार्थों से पूजन करे।
रात्रि में श्रद्धा पूर्वक कीर्तन, पाठ आदि करता हुआ जागरण करे और दूसरे दिन प्रातःकाल पूर्व की भाँति
विधिवत् पूजा करे फिर दक्षिणा के सहित उस प्रतिमा को आचार्य के हाथ दान कर दे ॥२५-२८॥ सम्पत्ति
रहने पर यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराने के बाद वह विद्वान् व्रती शक्ति के अनुसार एकाग्रभाव से तिल दान करे
और विधिवत् हवन भी करे। इस विधि से भली भाँति लक्ष्मीनारायण-व्रत का अनुष्ठान कर मनुष्य इस
लोक में पुत्र, पौत्र आदि के सहित लौकिक भोगों को भोगता है और मृत्यु के बाद अपने दश सहस्र कुलों के साथ
पाप-मुक्त होकर योगियों के लिए भी दुर्लभ विष्णुलोक को प्राप्त करता है ॥२६-३२॥
श्रीनारदीय पुराण के व्रताख्यान प्रकरण में मार्गशीर्ष पूर्णिमा को किये किये जाने वाले लक्ष्मीनारायणव्रत
का वर्णन नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥