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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 146

षोडशोऽध्यायः। १२७
विशालवक्षसं देवं तुहिनाद्रिसमप्रभम् । गजचर्माम्बरधरं सुरार्चितपदाम्बुजम् ॥९६॥
दृष्ट्वा पपात पादाग्रे दण्डवद्भुवि नारद । तत उत्थाय सहसा शिवाग्रे विहिताञ्जलिः ॥१००॥
प्रणनाम महादेवं कीर्तयन्शंकराद्वयम् । विज्ञाय भक्तिं भूपस्य शंकरः शशिशेखरः ॥१०१॥
उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वरं वरय वाञ्छितम् । तोषितोऽस्मि त्वया सम्यक् स्तोत्रेण तपसा तथा ॥१०२॥
एवमुक्तः स देवेन राजा संतुष्टमानसः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ॥१०३॥
भगीरथ उवाच
अनुग्राह्योऽस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर । तदा गङ्गां प्रयच्छास्मत्पितॄणां मुक्तिहेतवे ॥१०४॥
श्रीशिव उवाच
दत्ता गङ्गा मया तुभ्यं पितॄणां ते गतिः परा । तुभ्यं मोक्षः परश्चेति तमुक्त्वान्तर्दधे शिवः ॥१०५॥
कपर्दिनो जटास्रस्ता गङ्गा लोकैकपाविनी । पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छद्भगीरथम् ॥१०६॥
ततः प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी । भागीरथीति विख्याता त्रिषु लोकेष्वभून्मुने ॥१०७॥
सगरस्यात्मजाः पूर्वं यत्र दग्धाः स्वपाप्मना । तं देशं प्लावयामास गङ्गा सर्वसरिद्वरा ॥१०८॥
यदा संप्लावितं भस्म सागराणां तु गङ्गया । तदैव नरके मग्ना उद्धृताश्च गतैमसः ॥१०६॥
पुरा संक्रुध्यमानेन ये यमेनातिपीडिताः । त एव पूजितास्तेन गङ्गाजलपरिप्लुताः ॥११०॥
गतपापान्स विज्ञाय यमः सगरसंभवान् । प्रणम्याभ्यर्च्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानसः ॥१११॥
भो भो राजसुता यूयं नरकाद् भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्वं विष्णुमन्दिरम् ॥११२॥
इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मषाः । दिव्यदेहधरा भूत्वा विष्णुलोकं प्रपेदिरे ॥११३॥
चर्म का वस्त्र धारण करने वाले और सुरों से पूजित चरण वाले भगवान् शंकर को सामने उपस्थित देखकर
भगीरथ ने दण्डवत् प्रणाम किया । तत्पश्चात् शीघ्र उठकर शंकर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए ॥६७-१००॥
महादेव शंकर का गुणगान करते हुए बार-बार प्रणाम करने लगे । चन्द्रशेखर शंकर राजा की भक्ति देखकर बोले,
राजन् ! प्रसन्न हूँ, अभीष्ट वर माँगो, तुम्हारी स्तुति और तपस्या के वशीभूत हूँ। भगवान् शंकर की ऐसी बातें
सुनकर राजा संतुष्ट हो गया । उसने हाथ जोड़कर जगदीश्वर से बोला—महेश्वर ! यदि आप वरदान के द्वारा
मुझे अनुगृहीत करना चाहते हैं तो कृपा कर मुझे गंगाजी को दे दें जिनसे मेरे मृत पितरों को मुक्ति
प्राप्त हो ॥१०१-१०४॥
शिव बोले—मैने तुमको गंगा दे दी, जिससे तुम्हारे पितरों को परमगति की प्राप्ति होगी, तुम्हें भी परम
मोक्ष प्राप्त होगा, ऐसा वर देकर शिव अन्तर्हित हो गए । तदनन्तर कपर्दी शंकर की जटा से निकलकर लोक को
पवित्र करने वाली गंगा सारे संसार को पवित्र करती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे चलो । मुने ! उसी समय से वह
मलहारिणी निर्मल गंगा इस त्रिभुवन में भागीरथी नाम से विख्यात हो गयीं ।१०५-१०७॥ परम पवित्र (श्रेष्ठ)
नदी गंगा ने उस स्थान को जहाँ अपने पापों के कारण सगरपुत्र भस्म हो गए थे—जलमग्न कर दिया । ज्योंही
गंगाजल से सगर पुत्रों के शरीर-भस्म का स्पर्श हुआ त्योंही नरक में डूबे हुए वे पापमुक्त हो कर स्वर्ग को चले
गए । जिन सगर पुत्रों को यम ने क्रुद्ध होकर पीड़ा पहुँचाई थी, गंगाजल के स्पर्श से वे ही उनके द्वारा पूजे गए ।
यम ने सगर पुत्रों को पाप मुक्त जानकर उनकी विधिवत् पूजा की और प्रसन्न होकर कहा ॥१०८-१११॥
हे राजपुत्रो ! तुम लोग अब इस घोर दारुण नरक से मुक्त हो गए। इस विमान पर चढ़कर विष्णु-
लोक को चले जाओ । महात्मा यम की बातों को सुनकर वे निष्पाप सगर-पुत्र दिव्यरूप धारणकर विष्णुलोक को