बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ नारदीयपुराणम्
कृच्छ्रार्द्धमाचरेज्ज्ञानादज्ञानाद्वैन्दवद्वयम् । मातरं गुरुपत्नीं च दुहितृभगिनीस्नुषाः ॥३३॥
संगम्य प्रविशेदग्निं नान्या शुद्धिर्विधीयते । राज्ञीं प्रब्रजितां धात्रीं तथा वर्णोत्तमामपि ॥३४॥
गत्वा कृच्छ्रद्वयं कुर्यात्सगोत्रामभिगम्य च । अमूषु पितृगोत्रासु मातृगोत्रगतासु च ॥३५॥
परदारेषु सर्वेषु कृच्छ्रार्द्धं तपनं चरेत् । वेश्याभिगमने पापं व्यपोहन्ति द्विजास्तथा ॥३६॥
पीत्वा सकृत्सुतप्तं च पञ्चरात्रं कुशोदकम् । गुरुतल्पगतो कुर्याद्ब्राह्मणो विधिवद्व्रतम् ॥३७॥
गोघ्नस्य केचिदिच्छन्ति केचिच्चैवावकीर्णिनः । दण्डादूर्ध्वं प्रहारेण यस्तु गां विनिपातयेत् ॥३८॥
द्विगुणं गोव्रतं तस्य प्रायश्चित्तं विशोधयेत् । अङ्गुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः ॥३९॥
सार्द्रकस्सपलाशश्च गोदण्डः परिकीर्त्तितः । गवां निपातने चैव गर्भोऽपि संभवेद्यदि ॥४०॥
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं एषा गोघ्नस्य निष्कृतिः । बन्धने रोधने चैव पोषणे वा गवां रुजाम् ॥४१॥
संपद्यते चेन्मरणं निमित्तेनैव लिप्यते । मूच्छितः पतितो वापि दण्डेनाभिहतस्ततः ॥४२॥
उत्थाय षट्पदं गच्छेद्सप्त पञ्चदशापि वा । ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वापि पिबेद्यदि ॥४३॥
सर्वव्याधिप्रनष्टानां प्रायश्चित्तं न विद्यते । काष्ठलोष्टाश्मभिर्गावः शस्त्रैर्वा निहता यदि ॥४४॥
प्रायश्चित्तं स्मृतं तत्र शस्त्रे शस्त्रे निगद्यते । कष्ठे सान्तपनं प्रोक्तं प्राजापत्यं तु लोष्टके ॥४५॥
तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चाप्यतिकृच्छ्रकम् । औषधं स्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषु च ॥४६॥
कन्या, बहिन और पतोहू इनसे संगम करने से मनुष्य के लिए केवल अग्नि में जलकर मर जाना ही एक मात्र
प्रायश्चित्त है और कोई दूसरी शुद्धि नहीं ॥२६-३३॥
रानी, संन्यासिनी धाय, और उत्तम वर्ण की स्त्री अथवा सगोत्रा से सहवास करने पर मनुष्य दो
कृच्छ्र व्रत करे । पितृ गोत्र और मातृ गोत्र वाली स्त्री के साथ संगम करने वाले के लिए यही प्रायश्चित्त
है । पर स्त्रियों के साथ सहवास करने पर अर्द्धकृच्छ्र व्रत का पालन करना चाहिए । वेश्यागमन
करने से ब्राह्मण पाँच रात्रि तक एक-एक बार बहुत गर्म कुश-जल से स्नान करने से उस पाप से मुक्त हो सकता
है । गुरुपत्नीगामी ब्राह्मण विधिपूर्वक व्रत का पालन करे । कोई कहते हैं कि गोहन्ता को जो व्रत करना
चाहिए वही व्रत गुरुपत्नीगामी भी करे । और किन्हीं का कहना है कि ब्रह्मचर्यव्रत-भंग करने पर जो
प्रायश्चित्त होता है वही उसको करना चाहिए । जो डंडे से मारकर गौ को गिरा दे उसकी शुद्धि दूने गोव्रत से
होतो है ॥३४-३८॥ एक अंगुल मोटा एक हाथ लम्बा पलाश या और किसी गीली लकड़ी का दण्ड गोदण्ड
कहा गया है । गौ यदि सगर्भा हो और वह चोट खाकर गिर जाय तो प्रत्येक जीव के लिए एक-एक बार कृच्छ्र
व्रत करे, यही गोहत्या करने वाले के लिए प्रायश्चित्त है । बाँधने से, घर में बन्द करने से, उसको चारा खिलाने
से या रोग दूर करने के लिए ओषधि देने से यदि गौ मर जाय तो भी निमित्त (मृत्युकारण) का दोष लगता
है ॥३९-४१॥३
डंडा मारने से यदि गाय मूर्च्छित होकर-गिर जाय और फिर इसके बाद छह पग या दश पन्द्रह पग
चले, या घास खाने लगे या पानी पीने लगे तो दण्ड प्रहार जन्य पीड़ा के शीघ्र नष्ट हो जाने से कोई प्राय-
श्चित्त नहीं कहा गया है । काठ, पत्थर, ढेला या शस्त्र की मार से यदि गाय मर जाय तो इसके लिए
भिन्न भिन्न प्रकार से प्रायश्चित्त कहा गया है ॥४२-४४३॥ काठ के डंडे के मारने पर शान्तपन और ईंट से
मारने पर प्राजापत्य, पत्थर से मारने पर तप्तकृच्छ्र और शास्त्र से मारने पर अति कृच्छ्र व्रत करना चाहिए ।
गौ और ब्राह्मण को ओषधि, तेल अथवा भोजन देने से यदि कोई घटना हो जाय तो उसके लिए प्रायश्चित्त नहीं
करना पड़ता । इसी प्रकार तेल या ओषधि पिलाने या खिलाने से यदि कोई अप्रिय घटना हो जाय तो उसके