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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 1002

चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६६३
अद्य कृत्वा वृषोत्सर्गं व्रतं नक्तं च नारद । रुद्रलोकमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥६६॥
मार्गशीर्ष्यां पूर्णमास्यां स्वशक्त्या लवणोदकम् । देयं विप्राय शांताय सर्वकामसमृद्धये ॥६७॥
इदं जगत्पुरा लक्ष्म्या त्यक्तमासीत्ततो हरिः । पुरंदरश्च सोमश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः ॥६८॥
पंचैते पुष्ययुक्तायां पौर्णमास्यां जगद्वलात् । अलंकृतं पुनश्चक्रुः सौभाग्योत्सवकेलिभिः ॥६६॥
तस्मान्नरः पुष्ययोगे सर्वसौभाग्यवृद्धये । गौरसर्षपकल्केन समालभ्य स्वकां तनुम् ॥७०॥
स्नायात्सर्वौषधिजलैर्धारयेच्च नवांशुके । दृष्ट्वा च मंगलं द्रव्यं स्पृष्ट्वा नत्वा ततोऽर्चयेत् ॥७१॥
हरिशक्रेंदुपुष्येभ्यान्गंधाद्यैरुपचारकैः । विधाय होमं विप्रांश्च तर्पयेत्पायसाशनैः ॥७२॥
एतत्कृत्वा व्रतं विप्र रमाप्रीतिविवर्द्धनम् । अलक्ष्मीनाशनं चैव मोदतेह परत्र च ॥७३॥
पौर्णमास्यां ततो माघ्यां तिलकार्पासकंबलम् । रत्नानि कंचुकोष्णीषपादत्राणानि वा धनम् ॥७४॥
दत्त्वा प्रमोदर्ते स्वर्गे दानं वित्तानुसारतः । यस्त्वत्र शंकरं देवं पूजयेद्विधिपूर्वकम् ॥७५॥
सोऽश्वमेधफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते । फाल्गुने पूर्णमास्यां तु होलिकापूजनं मतम् ॥७६॥
संचयं सर्वकाष्ठानामुपलानां च कारयेत् । तत्राग्निं विधिबद्धुत्वा रक्षोघ्नैर्मंत्रविस्तरैः ॥७७॥
"असृक्पामयसंत्रस्तैः कृत्वा त्वं होलिबालिशैः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव' ॥७८॥
इति मंत्रेण संदीष्य काष्ठादिक्षेपणैस्ततः । परिक्रम्योत्सवः कार्यो गीतवादित्रनिःस्वनैः ॥७६॥
होलिका राक्षसी चेयं प्रह्लादभयदायिनी । ततस्तां प्रदहंत्येवं काष्ठाद्यैर्गीतमंगलैः ॥८०॥
संवत्सरस्य दाहोऽयं कामदाहो मतांतरे । इति जानीहि विप्रेन्द्र लोके स्थितिरनेकधा ॥८१॥
पक्षांते द्वे पृथग्दैवे ततोऽमात्रतमुच्यते । पृथक्शृणुष्व मे विप्र पितृणामतिवल्लभम् ॥८२॥
को दान देना चाहिये । प्राचीनकाल में जब लक्ष्मी ने इस जगत् का परित्याग कर दिया तब सौभाग्य, उत्सव तथा
केलि के प्रिय हरि, पुरंदर, सोम, तिष्य एवम् बृहस्पति ने पुष्ययुक्त पौर्णमासी में फिर से इस जगत् को अलंकृत
किया । इसलिये सौभाग्य-वृद्धि के अभिलाषी मानव पुष्ययुक्त पौर्णमासी के दिन अपने शरीर में श्वेत सरसों का
उबटन लगाकर सर्वोषधिजल से स्नान करे । तब नवीन वस्त्र धारण कर मांगलिक द्रव्यों का दर्शन एवम् स्पर्श
करके गंध आदि उपचारों से हरि, शक्र तथा चंद्रमा की पूजा करे । पश्चात् हवन कर ब्राह्मणों को खीर से परि-
तृप्त करे । विप्र ! जो व्यक्ति इस रमाप्रीतिवर्धक व्रत को करता है, वह दरिद्रता से मुक्त हो इस लोक में तथा
परलोक में आनन्दित होता है ॥६५-७३॥
माघी पूर्णिमा में वित्तानुसार तिल, कपास, कंबल, रत्न, कंचुक (कुर्ता), उष्णीष (पगड़ी), जूता तथा
द्रव्य दान करने से स्वर्ग में आनन्द मिलता है । जो उस दिन विधिपूर्वक शंकर देव की पूजा करता है, वह
अश्वमेध का फल प्राप्त कर विष्णुलोक में पूजित होता है। फाल्गुन की पूर्णिमा में होलिक'पूजन
किया जाता है । सब प्रकार की लकड़ियां एवम् गोष्ठे एकत्रित कर राक्षसनाक्षक मंत्रों को पढ़ते हुए उसमें
विधिपूर्वक आग लगा दे । "अष्ट..." इस मंत्र को पढ़ते हुए लकड़ी आदि डालकर अग्नि प्रज्वलित करके
परिक्रमा करे । फिर गाने-बजाने के साथ उत्सव मनाये । होलिका नामक राक्षसी प्रह्लाद को डराती थी । इसलिये
लोग गाना-बजाना करते हुए लकड़ी आदि से उसे इस प्रकार जलाते हैं। विप्रवर्य ! किसी के मत में यह संवत्सर-
दाह कहलाता है तो किसी के मत में कामदाह । क्योंकि लोक में स्थिति अनेक प्रकार की मानी जाती है ॥७४-८१॥
पक्षान्त तिथियाँ दो होती हैं-पूर्णिमा तथा अमावास्या । दोनोंके देवता पृथक्-पृथक् हैं ! इसलिए अमावास्या