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सर्वकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 876
८६२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
भोग्यत्वादेव। तदेतदन्नं चात्ता चैकं मिथुनं स्वप्ने। कथम् ? तयोरेष इन्द्राण्या इन्द्रस्य चैष संस्तवः, सम्भूय यत्र संस्तवं कुर्वाते अन्योन्यं स एष संस्तवः। कोऽसौ ? य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः, अन्तर्हृदये हृदयस्य मांसपिण्डस्य मध्ये।कारण विराट् अन्न है। वह यह अन्न और अत्ता स्वप्नमें एक मिथुन होते हैं। किस प्रकार ? उन इन्द्राणी और इन्द्रका यह संस्ताव है; जहाँ दोनों मिलकर एक-दूसरेका संस्तव (प्रशंसा) करते हैं, वह संस्ताव कहलाता है। वह संस्ताव क्या है ? जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। अन्तर्हृदयमें अर्थात् मांसपिण्डरूप हृदयके भीतर।
अथैनयोरेतद् वक्ष्यमाणमन्नं भोज्यं स्थितिहेतुः; किं तत् ? य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डो लोहित एव पिण्डाकारापन्नो लोहितपिण्डः। अन्नं जग्धं द्वेधा परिणमते; यत् स्थूलं तदधो गच्छति; यदन्यत्तत् पुनरग्निना पच्यमानं द्वेधा परिणमते—यो मध्यमो रसः स लोहितादिक्रमेण पाञ्चभौतिकं पिण्डं शरीरमुपचिनोति, योऽणिष्ठो रसः स लोहितपिण्ड इन्द्रस्य लिङ्गात्मनो हृदये मिथुनीभूतस्य, यं तैजसमाच-और इन दोनोंका यह आगे कहा जानेवाला अन्न-भोज्य यानी स्थितिका हेतु है, वह क्या है ? जो कि यह हृदयके भीतर लोहितपिण्ड है—पिण्डाकारको प्राप्त हुआ लोहित ही लोहितपिण्ड है। खाया हुआ अन्न दो प्रकारसे परिणत होता है; जो स्थूल होता है, वह नीचे चला जाता है और जो दूसरे प्रकारका होता है, वह पुनः अग्निसे पचाया जाकर दो प्रकारसे परिणत हो जाता है—जो मध्यम रस होता है, वह लोहितादि क्रमसे पाञ्चभौतिक पिण्डरूप शरीरको पुष्ट बनाता है और जो सूक्ष्मतम रस होता है, वह हृदयमें मिथुनभावको प्राप्त हुए लिङ्गात्मा इन्द्रका यह लोहितपिण्ड है, जिसे तैजस कहते