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सर्वकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1233, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1233

ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१९


| पुत्र उत्तिष्ठति ह–दृष्टमेतत् फलम् ।<br><br>अदृष्टं तूक्थस्य सायुज्यं सलोकतां<br><br>जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | यानी पुत्र उत्पन्न होता है—यह इसका प्रत्यक्ष फल है। परोक्ष फल यह है कि जो ऐसा जानता है, वह उक्थके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |


यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना

यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥

'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है। सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥


| यजुरिति चोपासीत प्राणम्;<br><br>प्राणो वै यजुः; कथं यजुः प्राणः?<br><br>प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते। न ह्यसति प्राणे केनचित् कस्यचिद् योगसामर्थ्यम्; अतो युनक्तीति प्राणो यजुः ।<br><br>एवंविदः फलमाह—युज्यन्त उद्यच्छन्त इत्यर्थः। हास्मा एवंविदे सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्यं श्रेष्ठ- | 'यजुः' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु है; प्राण यजु किस प्रकार है? क्योंकि प्राणमें ही समस्त प्राणियोंका योग होता है। प्राणके न रहनेपर किसीके साथ किसीका योग होनेका सामर्थ्य नहीं है; अतः योग करता है, इसलिये प्राण यजु है।<br><br>इस प्रकार उपासना करनेवालेका श्रुति फल बतलाती है—इस प्रकार उपासना करनेवालेको सम्पूर्ण भूत |