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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 417 में से

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पृष्ठ 39

१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १ । १ । २७ ॥
चेत्=यदि कहो; उपदेशभेदात्=उपदेशमें भिन्नता होनेसे; न=गायत्रीशब्द
ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; उभयस्मिन् अपि=
क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात्=( वास्तवमें ) कोई विरोध
नहीं है ।
व्याख्या—यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६) मे तो 'तीन
पाद दिव्य लोकमे हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार
बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र ( ३ । १३ । ७) मे 'ज्योति:'
नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन-
मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है; तो यह
कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनो जगहके वर्णनकी शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर
भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द-
वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है ।
सम्बन्ध—'अत एव प्राणः' (१ । १ । २३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया
है कि श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किन्तु कौषीतकि-उपनिषद्
( ३ । २ ) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा हे कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू
आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर ।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि
इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका ? प्राणवायुका ?
जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका ? इसपर कहते हैं—
प्राणस्तथानुगमात् ॥ १ । १ । २८ ॥
प्राणः=प्राणशब्द ( यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है ); तथानुगमात्=क्योकि
पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है ।
व्याख्या—इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण'
शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे
प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके
उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण' 'ब्रह्म' ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा
कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-