ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १५—१६ ] अध्याय ४ ३४५
हैं। यदि ज्ञान होनेके बाद शरीर न रहे तो ज्ञानका उपदेशक न रहनेके
कारण सम्प्रदायपरम्परा नष्ट हो जायगी ? इसपर कहते हैं—
अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ ४ । १ । १५ ॥
तु=किन्तु; अनारब्धकार्ये=जिनका फलभोगरूप कार्य आरम्भ नहीं हुआ
है, ऐसे; पूर्वे=पूर्वकृत पुण्य और पाप; एव=ही नष्ट होते हैं; तदवधेः=क्योकि
श्रुतिमे प्रारब्ध कर्म रहनेतक शरीरके रहनेकी अवधि निर्धारित की गयी है ।
व्याख्या—पूर्वसूत्रोमे श्रुति-प्रमाणसे जो पूर्वकृत पुण्यकर्म और पापकर्मोंका
नाश बताया गया है, वह केवल उन्हीं कर्मोंका होता है जो कि अपना फल
देनेके लिये तैयार नहीं हुए थे, सञ्चित-अवस्थामे ही एकत्र हो रहे थे । जिन
प्रारब्ध कर्मोंका फल भोगनेके लिये उस विद्वान्को शरीर मिला है, उनका नाश
नहीं बताया गया है; क्योकि ‘तस्य तावदेवं चिर यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ।’
‘उसका तभीतक विलम्ब है, जबतक प्रारब्धका नाश होकर देहपात नहीं हो
जाता । उसके बाद वह परमात्मामे विलीन हो जाता है ।’ (छा० उ० ६ । १४ ।
२ ) । इस प्रकार श्रुतिमें प्रारब्धक्षयपर्यन्त ज्ञानीके शरीरकी स्थिति बतायी
गयी है ।
सम्बन्ध—जब ज्ञानीका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता, तब उसके
लिये श्रुतिमें आजीवन अग्निहोत्रादि आश्रम-सम्बन्धी कर्मोंका विधान कैसे किया
गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ ४ । १ । १६ ॥
अग्निहोत्रादि=आश्रमोपयोगी अग्निहोत्र आदि विहित कर्मोंके अनुष्ठानका
विधान; तु=तो; तत्कार्याय=उन-उन विहित कर्मोंकी रक्षा करनेके लिये; एव=
ही है; तद्दर्शनात्=यही श्रुतियो और स्मृतियोंमें देखा गया है ।
व्याख्या—ज्ञानी महापुरुषोंके लिये जो श्रुतिमे विधान किये हुए अपने
आश्रम-सम्बन्धी अग्निहोत्रादि कर्म जीवनपर्यन्त करनेकी बात कही गयी है,
( ब्र० सू० ३ । ४ । ३२ ) वह कथन उन कर्मोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही है ।
अर्थात् साधारण जनता उसकी देखा-देखी कर्मोंका त्याग करके भ्रष्ट न हो;
अपि तु अपने-अपने कर्मोंमें श्रद्धापूर्वक लगी रहे, इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये
वैसा कहा गया है, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यह बात श्रुतियों और स्मृतियोमे भी देखी
जाती है । श्रुतिमें तो जनक, अश्वपति, याज्ञवल्क्य आदि ज्ञानी महापुरुषोंके