ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे
समझ लेना चाहिये ।
ध्यान रहे कि इस प्रकरणमे आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि
विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है ।
अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान ( पाण्डित्य ), उक्त विकारोका अभाव ( बाल्यभाव )
और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन ( मौन ) —इन तीनोकी परिपक्व-अवस्था
होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है ।
सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है, वह संन्यास-
आश्रमका द्योतक है; अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही
ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमे भी उसका अधिकार है ?
यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो ( छा० उ० ८ ।
१५ । १ ) की श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों
समाप्त किया गया है ? वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे
सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं--
कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३ । ४ । ४८ ॥
कृत्स्नभावात् = गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये;
तु = ही; गृहिणा = ( उस प्रकरणमें ) गृहस्थ-आश्रमके साथ; उपसंहारः = ब्रह्म-
विद्याके प्रकरणका उपसंहार किया गया है ।
व्याख्या—गृहस्थ-आश्रममे चारो आश्रमोंका भाव है; क्योकि ब्रह्मचारी भी
गृहस्थाश्रममें स्थित गुरुके पास ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता है, वानप्रस्थ और
संन्यासीका भी मूल गृहस्थ ही है । इस प्रकार चारो आश्रमोका गृहस्थमे अन्त-
र्भाव है और ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमे है, यह भी श्रुतिका अभिप्राय
है, इसलिये वहाँ उस प्रकरणका गृहस्थके वर्णनके साथ-साथ उपसंहार किया
गया है तथा पूर्वप्रकरणमें जो संन्यास-आश्रमका संकेत है, वह साधनोकी
सुगमताको लक्ष्य करके कहा गया है; क्योकि किसी भी आश्रममे स्थित साधक-
को ब्रह्मज्ञानसम्पादनके लिये पुत्रैषणा आदि सभी प्रकारकी कामनाओ तथा राग-
द्वेषादि विकारोका सर्वथा नाश करके मननशील तो होना ही पड़ेगा । दूसरे
आश्रमोंमें विघ्नोकी अधिकता है और संन्यास-आश्रममें स्वभावसे ही उनका अभाव