ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
प्राकृत जड और चेतन पदार्थोंसे भिन्न बताकर उसका लक्ष्य कराया गया है
और अन्तमे कहा गया है कि इसे पाकर उपासक जन्म-मरणसे छूट जाता है ।
इन सभी वर्णनोंका उद्देश्य एकमात्र उस परब्रह्म परमेश्वरको लक्ष्य कराकर
उसे प्राप्त करा देना है । सभी जगह प्रकारभेदसे उस परमात्माका ही चिन्तन
करनेके लिये कहा गया है, अतः विधि और साध्यकी एकताके कारण साधनरूप
विद्याओमे वास्तविक भेद नहीं है, अधिकारीके भेदसे प्रकारभेद है ।
इसके सिवा, जो भिन्न शाखावालोके द्वारा वर्णित एक ही प्रकारकी वैश्वानर
आदि विद्याओमे आंशिक भेद दिखलायी देता है, उससे भी विद्याओमें भेद नहीं
समझना चाहिये; क्योकि उनमे सर्वत्र विधिवाक्य और फलकी एकता है, इसलिये
उनमे कोई वास्तविक भेद नहीं है ।
सम्बन्ध-वर्णन-शैलीमें कुछ भेद होनेपर भी विद्यामें भेद नहीं मानना
चाहिये, इसका प्रतिपादन करते हैं—
भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि ॥ ३ । ३ । २ ॥
चेत्=यदि ऐसा कहो कि; भेदात्=उन स्थलोंमें वर्णनका भेद है, इसलिये;
न=एकता सिद्ध नहीं होती; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि;
एकस्याम्=एक विद्यामें; अपि=भी ( इस प्रकार वर्णनका भेद होना अनुचित
नहीं है ) ।
व्याख्या—जगत्के कारणको ब्रह्म कहा गया है और वही उपास्य होना चाहिये;
किन्तु कहीं तो 'जगत्की उत्पत्तिके पूर्व एक सत् ही था, उसने इच्छा की कि मैं बहुत
होऊँ, उसने तेजको उत्पन्न किया।' (छा० उ० ६ । २ । १, ३) । इस प्रकार जगत्-
की उत्पत्ति सत्से बतायी है । कहीं 'पहले यह एक आत्मा ही था, दूसरा कोई भी
चेष्टाशील नहीं था, उसने इच्छा की कि मैं लोकोंको रचूँ।' ( ऐ० उ० १ । १ ) ।
इस प्रकार जगत्की उत्पत्ति आत्मासे बतायी है, कहीं 'आनन्दमय'का वर्णन करनेके
अनन्तर उसीसे सब जगत्की उत्पत्ति बतायी है, वहाँ किसी प्रकारके क्रमका वर्णन नहीं
किया है ( तै० उ० २ । ६-७)। कहीं आत्मासे आकाशादिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति
बतायी है (तै० उ० २।१), कहीं रयि और प्राण-इन दोनोके द्वारा जगत्की उत्पत्तिका
वर्णन किया है ( प्र० उ० १ । ४ ) तथा कहीं 'यह उस समय अप्रकट था, फिर
प्रकट हुआ।' ( बृह० उ० १।४।७) ऐसा कहा है। इस प्रकार अव्यक्तसे जगत्की