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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 417 में से

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पृष्ठ 236

सूत्र ६—७ ] अध्याय ३ २१५
पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे स्वयं
ही देवताओंके भोग्य बन जाते हैं, तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना कैसे सिद्ध
होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३ । १ । ७ ॥
अनात्मवित्त्वात् = वे लोग आत्मज्ञानी नहीं है, इस कारण (आत्मज्ञानीकी
अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये ); वा = ही; भाक्तम् = उनको देवताओं-
का अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि = क्योंकि; तथा = उस प्रकारसे (उनका
हीनत्व और स्वर्गलोकमे नाना प्रकारके भोगोको भोगना ) भी; दर्शयति = श्रुति
दिखलाती है ।
व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं,
अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओका अन्न और
देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमे तो, श्रुति यह
कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको देखकर ही तृप्त
हो जाते है।' (छा० उ० ३ । ६ । १)* अतः इस कथनका यह भाव है कि
राजाके नौकरोकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते है। इस भावके
वचन श्रुतिमे दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको न जानकर
दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह जैसे यहाँ लोगोंके घरोंमे पशु होते हैं,
वैसे ही देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १ । ४ । १०)† आत्म-
ज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है।
इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओके साथ आनन्दका उपभोग
करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय
पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको होता
है‡।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है—
'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥

  • 'न ह वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।'
    † 'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते••••••यथा पशुरेवँ स देवानाम्।'
    ‡ अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः • स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा
    देवत्वमभिसंपद्यन्ते । ( बृह० उ० ४ । ३ । ३३ )