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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 417 में से

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पृष्ठ 229

२०८ वेदान्त-दर्शन .[ पाद ४
प्रकार भूमिरूप अन्नके कार्य मांस, विष्ठा और मन—ये तीनों बताये गये हैं,
उसी प्रकार उस प्रकरणके शब्दोंमें जिस-जिस तत्त्वके जो-जो कार्य बताये गये
हैं, उसके वे ही कार्य हैं, ऐसा समझ लेना चाहिये । वहाँ श्रुतिने जलका कार्य
मूत्र, रक्त और प्राणको तथा तेजका कार्य हड्डी, मज्जा और वाणीको बताया है ।
अतः इन्हे ही उनका कार्य समझना चाहिये ।
सम्बन्ध—जब तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करके सबकी रचना की गयी, तब
खाये हुए किसी एक तत्त्वसे अमुक वस्तु हुई—इत्यादि रूपसे वर्णन करना कैसे
संगत हो सकता है ? इसपर कहते हैं—
वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २ । ४ । २२ ॥
तद्वादः = वह कथन; तद्वादः = वह कथन; तु = तो; वैशेष्यात् = अधिकताके
नातेसे है ।
व्याख्या—तीनोंके मिश्रणमे भी एककी अधिकता और दूसरोंकी न्यूनता रहती
है, अतः जिसकी अधिकता रहती है उस अधिकताको लेकर व्यवहारमे मिश्रित तत्त्वोका
अलग-अलग नामसे कथन किया जाता है; इसलिये कोई विरोध नहीं है । यहाँ
'तद्वादः', पदका दो बार प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ।
इस प्रकरणमे जो मनको अन्नका कार्य और अन्नमय कहा गया है, प्राणोंको
जलका कार्य और जलमय कहा गया है तथा वाणीको तेजका कार्य और तेजोमयी
कहा गया है, वह भी उन-उन तत्त्वोके सम्बन्धसे उनका उपकार होता हुआ
देखा जानेके कारण गौणरूपसे ही कहा हुआ मानना चाहिये । वास्तवमे मन,
प्राण और वाणी आदि इन्द्रियाँ भूतोका कार्य नहीं हैं; भूतोंसे भिन्न पदार्थ हैं,
यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है । (ब्र० सू० २ । ४ । २)
चौथा पाद सम्पूर्ण ।
श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र) का
दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।