ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३०-३१ ] अध्याय २ १७९
कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें
यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित
उस परब्रह्ममें स्थित होता है ( प्र० उ० ४ । ११ ), * इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकाल-
में समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष
नहीं आ सकता ।
सम्बन्ध-प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है,
वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती, इस स्थितिमें
बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारण-शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध
कैसे रह सकता है ? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे
सम्बन्ध हो जाता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात् ॥ २ । ३ । ३१ ॥
पुंस्त्वादिवत्=पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः=पहलेसे विद्यमान; अस्य=
'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते
हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब
पुनः-पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी
परमदेव मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न
देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता
है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है।
उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।'
अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु
शृणोति । देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति । दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं
चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ।
'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है; जो बार-बार
देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता
है। नाना देश और दिशाओंमें बार बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव
करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको
भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमान-
को भी देखता है; इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर
देखता है।'
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥