ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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सूत्र विषय पृष्ठ
१८-२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास-आश्रमकी सिद्धि ... ३१०-३१२
२१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान ... ३१३-३१४
२३-२४ { उपनिषद्वर्णित कथाएँ विद्याका ही अङ्ग हैं, यज्ञका नहीं;
इसका प्रतिपादन ... ... ३१४-३१५
२५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ३१५-३१६
२६-२७ { विद्याकी प्राप्तिके लिये वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी अपेक्षा तथा
शम-दम आदिकी अनिवार्य आवश्यकता ... ३१६-३१८
२८-३१ { प्राणसङ्कटके सिवा अन्य समयमें आहार-शुद्धिविषयक
सदाचारके त्यागका निषेध ... ... ३१८-३२०
३२-३३ ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रमकर्मके अनुष्ठानकी आवश्यकता ३२१
३४-३९ { भक्तिसम्बन्धी श्रवण-कीर्तन आदि कर्मोंके अनुष्ठानकी अनिवार्य
आवश्यकता तथा भागवतधर्मकी महत्ताका प्रतिपादन ... ३२१-३२७
४०-४३ { वानप्रस्थ, संन्यास आदि ऊँचे आश्रमोंसे वापस लौटनेका निषेध,
लौटनेवालेका पतन और ब्रह्मविद्या आदिमें अनधिकार ... ३२७-३२९
४४-४६ { उद्गीथ आदिमे की जानेवाली उपासनाका कर्ता तो ऋत्विक् है
किंतु उसके फलमें यजमानका अधिकार है, इसका वर्णन ३२९-३३०
४७-५० संन्यास, गृहस्थ आदि सब आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार ३३१-३३४
५१-५२ { मुक्तिरूप फल इस जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें, इसी लोक-
मे मिलता है, या लोकान्तरमे ? इसका नियम नहीं है यह कथन ३३४-३३५
चौथा अध्याय
पहला पाद
१-२ { उपदेश-ग्रहणके पश्चात् ब्रह्मविद्याके निरन्तर अभ्यासकी
आवश्यकता ... ... ... ३३६-३३७
३ आत्मभावसे परब्रह्मके चिन्तनका उपदेश ... ३३७-३३८
४-५ प्रतीकमे आत्मभावनाका निषेध और ब्रह्मभावनाका विधान ... ३३८-३३९
६ उद्गीथ आदिमे आदित्य आदिकी भावना ... ३३९
७-१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ... ३४०-३४१
११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम ३४१-३४२
१२ आजीवन उपासनाकी विधि ... ३४२-३४३
१३-१४ { ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी शुभाशुभ
कर्मोंसे असम्बन्ध ... ... ... ३४३-३४४
१५ शरीरके हेतुभूतप्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत समयतक रहना ३४५