ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३८--३९ ] अध्याय २ १५५
कर लेता है, वह इस संसारमे पुनः जन्म नहीं धारण करता । हाथमे रुद्राक्षका
कंकण पहनना, मस्तकपर जटा धारण करना, मुर्देकी खोपड़ी लिये रहना तथा
शरीरमे भस्म लगाना—इन सबसे मुक्ति मिलती है । इत्यादि प्रकारसे वे चिह्न
धारण करनेमात्रसे भी मोक्ष होना मानते हैं । इसके सिवा, वे महेश्वरको केवल
निमित्त कारण तथा प्रधानको उपादान कारण मानते हैं । ये सब बातें युक्तिसंगत
नहीं हैं; इसलिये यह मत माननेयोग्य नहीं है ।
सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं—
सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३८ ॥
सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी ( यह मान्यता
असंगत है ) ।
व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण
माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह
बताना आवश्यक है । लोकमे यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण
कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोग-
सम्बन्ध स्थापित करते हैं; किन्तु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका
प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव उसके द्वारा
सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी । जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब
बाते युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती; क्योंकि वे परब्रह्म
परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते है, अतः वह शक्तिशाली
परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है । वेदोंके प्रति
जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमे जो कुछ कहा गया
है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है। न रहे तो भी
कोई चिन्ता नहीं है; किन्तु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है,
उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये । परन्तु पाशुपतो-
की उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही । अतः वह सर्वथा
अमान्य है ।
सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं—
अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ३९ ॥