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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

( १५ )
सूत्र विषय पृष्ठ
१७-१९ इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता ... ... २०५-२०७
२० ब्रह्मसे ही नाम-रूपकी रचनाका कथन ... ... २०७
२१-२२ सब तत्त्वोंका मिश्रण होनेपर भी पृथिवी आदिकी अधिकतासे
उनके पृथक्-पृथक् कार्यका निर्देश ... ... २०७-२०८
तीसरा अध्याय
पहला पाद
१-६ शरीरके बीजभूत सूक्ष्म तत्त्वोंसहित जीवके देहान्तरमे गमन-
का कथन, 'पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषरूप हो जाता है'
श्रुतिके इस वचनपर विचार, उस जलमें सभी तत्त्वोंके संमिश्रण-
का कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार ... २०९-२१४
७-११ स्वर्गमे गये हुए पुरुषको देवताओंका अन्न बताना औपचारिक
है, जीव स्वर्गसे कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, श्रुतिमें
'चरण' शब्द कर्मसंस्कारोंका उपलक्षण और पाप-पुण्यका
बोधक है, इसका उपपादन ... ... २१५-२१८
१२-१७ पापी जीव यमराजकी आज्ञासे नरकमें यातना भोगते हैं, स्वर्गमे
नहीं जाते, कौषीतकिश्रुतिमे भी समस्त शुभकर्मियोंके लिये ही
स्वर्गगमनकी बात आयी है; इसका वर्णन ... २१८-२२१
१८-२१ यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे भिन्न एव अधम चौथी
गति है, इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवोंका उद्भिजमे अन्तर्भाव २२१-२२३
२२-२७ स्वर्गसे लौटे हुए जीव किस प्रकार आकाश, वायु, धूम, मेघ, धान,
जौ आदिमे स्थित होते हुए क्रमशः गर्भमें आते हैं, इसका स्पष्ट वर्णन २२३-२२५
दूसरा पाद
१-६ स्वप्न मायामात्र और शुभाशुभका सूचक है, भगवान् ही जीवको
स्वप्नमे नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं,
परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं; उसके अनादि बन्धन और
मोक्ष भी परमात्माके सकाशात्से हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका
तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ... ... २२६-२३०
७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाडियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस
समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे
पुनः उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमे
अधूरी सुषुप्तावस्थाका प्रतिपादन ... ... २३०-२३३