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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished737 पृष्ठ

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( २६२ )
परिकरवृत्तन्मध्ये भूगोलस्थित<sup>१</sup>द्रष्टुः ।
पूर्वापरयोर्लग्नं याम्योत्तरयो<sup>२</sup>र्नतोन्नतं क्षितिजात् ॥ ४६<sup>३</sup> ॥
स्वा<sup>५</sup>क्षांशैरुन्<sup>१</sup>मण्डलमहानिशो वृ<sup>६</sup>द्धिहानिकरम् ।
विषुवन्मण्डलमूर्ध्वं सम<sup>३</sup>मंडलस्थितं स्व<sup>४</sup>कक्षांशैः ॥ ५०<sup>२</sup> ॥
याम्ये<sup>२</sup>नोत्तरतोधः क्षितिजे<sup>३</sup> प्राच्यपरयो र्लग्नम्<sup>१</sup> ।
• विषुवन्मण्डललग्नं मेषतुलादावुदक्कु<sup>४</sup>लीरादौ ॥ ५१<sup>५</sup> ॥

४६. (घ) १. भूगोलस्तस्थित द्रष्टुः (ङ) for (भूगोलस्थितद्रष्टुः)
(वि०—यहां कोई क्रमसंख्या नहीं दी गई) (च)
(ग) १. स्थस्थितद्रष्टुः ॥४६॥ for (स्थितद्रष्टुः)
२. याम्योत्तरयोनंतं क्षितिजात् for (याम्योत्तरयोर्नतोन्नतं