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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मन्वंतराणां सर्वेषां कल्पानां चैव वर्णनम् ।
कीर्त्तनं ब्रह्मवृक्षस्य ब्रह्मजन्म प्रकीर्त्यते ॥४६
अतः परं ब्रह्मणश्च प्रजासर्गोपवर्णनम् ।
अवस्थाश्चात्र कीर्त्यन्ते ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥४७
कल्पानां संभवश्चैव जगतः स्थापनं तथा ।
शयनं च हरेरप्सु पृथिव्युद्धरणं तथा ॥४८
सविशेषः पुरादीनां वर्णाश्रमविभाजनम् ।
ऋक्षाणां ग्रहसंस्थानां सिद्धानां च निवेशनम् ॥४९

ब्रह्माजी की सर्वोत्तम प्रसूति हिरण्मय अण्ड है। उस हिरण्मय अण्ड का आवरण सागर है, जलों का आवरण तेज के द्वारा हुआ ।४३। उस तेज का वायु से ओर वायु का आकाश से आवरण हुआ था फिर भूत आदि से हुआ था। भूत आदि का महत् से और महान् का अव्यक्त के द्वारा आवरण हुआ था ।४४। भूतों के अन्दर रहने वाला अण्ड ही उपवर्णित है। इसमें नदियों का ओर पर्वतों का प्रादुर्भाव पढ़ा जाया करता है ।४५। समस्त मन्वन्तरों का और सब कल्पों का वर्णन है। इस ब्रह्म वृक्ष का कीर्त्तन ही ब्रह्म का जन्म कीर्त्तित किया जाया करता है ।४६। इसके आगे ब्रह्माजी की प्रजाओं का उपसर्ग का उप वर्णन है। अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी की इसमें अवस्था का कीर्त्तन किया जाता है ।४७। कल्पों की उत्पत्ति-जगत की स्थापना भगवान् हरि का जलों में शयन करना तथा पृथिवी के उद्धार का वर्णन है ।४८। पुर आदि का विशेषता के साथ वर्णन, चारों वर्णों और चारों आश्रमों का विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों का संस्थान और सिद्धों के निवास स्थलों का वर्णन है ।४६।

योजनानां यथा चैव संचरो बहुविस्तरः ।
स्वर्गस्थानविभागश्च मर्त्यानां शुभचारिणाम् ॥५०
वृक्षाक्षामोषधीनां च वीरुधां च प्रकीर्त्तनम् ।
देवतानामृषीणां च द्वे सृती परिकीर्त्तिते ॥५१
आस्रादीनां तरूणां च सर्जनं व्यजनं तथा ।
पशूनां पुरुषाणी च संभवः परिकीर्त्तितः ॥५२