संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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घटना विद्यमान है—खम्भे से समुत्पन्न नर और तिर्यंग् (पशु) का वपु
धारण करने वाले समस्त प्राणियों का भूत नरसिंह ने हिरण्यकशिपु जैसे
महान् बलवान् को मार डाला था ॥५५-५६॥
पुरा हि चंडिका नाम नारी मायाविजृंभिणी ।
निशुम्भशुंभौ महिषं व्यापादितवती रणे ॥५७
तत्प्रसंगेन बहवस्तया दैत्या विनाशिताः ।
अतो वदामि नावज्ञा स्त्रीमात्रं क्रियतां क्वचित् ॥५८
शक्तिरेव हि सर्वत्र कारणं विजयश्रियः ।
शक्तेराधारतां प्राप्तैः स्त्रीपुंलिङ्गैर्न नो भयम् ॥५९
शक्तिस्तु सर्वतो भाति संसारस्य स्वभावतः ।
तर्हि तस्या दुराशायाः प्रवृत्तिर्ज्ञायतां त्वया ॥६०
केयं कस्मात्समुत्पन्ना किमाचारा किमाश्रया ।
कियद्बला किसहाया वा देव तत्प्रविचार्य्यताम् ॥६१
इत्युक्तः स विषङ्गेण को विचारो महौजसाम् ।
अस्मद्बले महासत्त्वा अक्षौहिण्यधिपाः शतम् ॥६२
पातुं क्षमास्ते जलधीनलं दग्धुं त्रिविष्टपम् ।
अरे पापसमाचार किं वृथा शङ्कसे स्त्रियः ॥६३
प्राचीन समय में भी चण्डिका नाम वाली एक नारी ही तो थी जिसने
रण में निशुम्भ-शुम्भ और महिष को मार डाला था ॥५७॥ उसी के प्रसंग से
उसने बहुत से दैत्यों का विनाश कर दिया था । इसी कारण से मैं यही
बतलाता हूँ कि यह समझ करके केवल स्त्री ही तो है, कभी भी अवज्ञा नहीं
करनी चाहिए ॥५८॥ शक्ति ही सर्वत्र विजय की श्री का कारण हुआ करती
है । शक्ति के आधार को प्राप्त हैं उन स्त्री और पुरुषों से हम को भय नहीं
है ॥५९॥ इस संसार की स्वभाव से ही शक्ति ही सर्व ओर विभात हुआ करती
है । सो उस बुरे आशय वाली की क्या प्रवृत्ति है—आप को समझ लेना
चाहिए ॥६०॥ हे देव ! आपको इन सभी बातों का विचार कर लेना चाहिए
कि यह कौन है—किससे यह समुत्पन्न हुई है—इसके आचार क्या हैं—
इसका आश्रय क्या है—इसका बल कैसा और कितना है—इसकी सहायता