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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

२७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अथ सा ललितेशानी सर्वशक्तिमहेश्वरी ।
महासाम्राज्यपदवीमारूढा परमेश्वरी ॥६८
चचाल भंडदैत्यस्य क्षयसिद्धयभिकांक्षिणी ।
शब्दयंते दिशः सर्वाः कंपते च वसुन्धरा ॥६६

इनमें वहाँ पर देवता ही उन रथों के सारथि थे ऐसा बताया गया है। जो गेय रथचक्र था उसकी सारथि हसन्तिका थी ।६३। किरिचक्र रथेन्द्र की स्तम्भिनी सारथि कही है। ललिता का उत्तम श्रेष्ठ रथ दश योजन ऊँचा था ।६४। गीतचक्र ह्योत्तम सात योजन उच्छ्राय वाला था। षट् योजन ऊँचा हे मुने ! किरिचक्र रथ था ।६५। महान् मुक्ताओं से विनिर्मित आतपत्र (छत्र) दशयोजन विस्तार वाला था। ललितेशानी का रथ ही ऐसा था और अन्य का नहीं था ।६६। और वह ही शक्ति के साम्राज्य का सूचक कीर्तित किया गया है। सामान्य छत्र तो अन्य दोनों पर भी थे ।६७। वह ललिता ईशानी समस्त शक्तियों की महेश्वरी थी। वह परमेश्वरी महान् साम्राज्य की पदवी पर समारूढ़ थी ।६८। वह भंड दैत्य के क्षय की सिद्धि की अभिकांक्षा वाली वहाँ से चली थी। सभी दिशाएँ उस समय में शब्दायमान हो रही थीं और वसुधा प्रकम्पित हो रही थी ।६६।

क्षुभ्यंति सर्वभूतानि ललितेशाविनिर्गमे ।
देवदुन्दुभयो नेदुनिपेतुः पुष्पवृष्टयः ॥१००
विश्वावसुप्रभृतयो गन्धर्वाः सुरगायकाः ।
तुम्बुरुर्नारदश्चैव साक्षादेव सरस्वती ॥१०१
जयमंगलपद्यानि पठंतः पटुगीतिभिः ।
हर्षसंफुल्लवदनाः स्फुरत्पुलकभूषणाः ।
मुहुर्जययेत्येवं स्तुवाना ललितेश्वरीम् ॥१०२
हर्षेणाढ्या मदोन्मत्ताः प्रनृत्यंतः पदे पदे ।
सप्तर्षयो वशिष्ठाद्या ऋग्यजुः सामरूपिभिः ॥१०३
अथर्वरूपैर्मंत्रैश्च वर्धयंतो जयश्रियम् ।
हविषेव महावह्निशिखामत्यंतपाविनीम् ॥१०४
आशीर्वादेन महता वर्धयामासुरुत्तमाः ।