संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 630, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
थे एवं वज्र की उपमा के आकार वाले थे तथा आयुधों के सहित एवं परि-
च्छदों से युक्त थे दिए थे । २५। इसके अनन्तर उन दोनों शिवा और शिव का
परम मंगल अभिषेक किया था। इसके उपरान्त एक विमान बनवाया था
जिसका नाम कुसुमाकर था । २६। इसकी रचना विधाता ने की थी जो कि
अम्लान मालाओं वाला था तथा नित्य ही आयुधों के द्वारा अभेद्य था । यह
इच्छा के अनुरूप दिवलोक और भूलोक में गमन करने वाला तथा सुसमृद्धि
से समन्वित था ।२७। जिसके केवल गन्ध से ही भ्रान्तिक्षुधा-रोग और आर्ति
सब नष्ट हो जाया करती हैं और यह मन के आह्लाद को करने वाला तथा
परम शुभ था । २८।
तद्विमानमथारोप्य तावुभौ दिव्यदंपती ।
चामरव्यजनच्छत्रध्वजयष्टिमनोहरम् ।।२९
वीणावेणुमृदंगादिविविधैस्तौर्यवादनैः ।
सेव्यमाना सुरगणैर्निर्गत्य नृपमन्दिरात् ।।३०
ययौ वीथीं विहारेण शोभायन्ती निजौजसा ।
प्रतिहर्म्याग्रसंस्थाभिरप्सरोभिः सहस्रशः ।।३१
सलाजाक्षतहस्ताभिः पुरंध्रीभिश्च वर्षिता ।
गाथाभिर्मंगलार्थाभिर्वीणावेण्वादिनिस्वनैः ।
तुष्यन्ती वीथिवीथीषु मन्दमन्दमथाययौ ।।३२
प्रतिगृह्याप्सरोभिस्तु कृतं नीराजनाविधिम् ।
अवरुह्य विमानाग्रात्प्रविवेश महासभाम् ।।३३
सिंहासनमधिष्ठाय सह देवेन शम्भुना ।
यद्यद्वांछंति तत्रस्था मनसैव महाजनाः ।
सर्वज्ञा साक्षिपातेन तत्तत्कामानपूरयत् ।।३४
तद्दृष्ट्वा चरितं देव्या ब्रह्मा लोकपितामहः ।
कामाक्षीति तदाभिख्यां ददौ कामेश्वरीति च ।।३५
उस विमान पर ये दोनों शुभ दम्पती समारूढ़ होकर नृप मन्दिर से
बाहिर निकले थे। इस विमान में चमर-व्यजन-छत्र-ध्वजा आदि से परम