सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 607, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 607

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६७

थी ।२६। इसके अनन्तर वह दैत्यराज अपने मन्त्रियों के सहित वहाँ पर आ गया था । उसने वीणा की परम मधुर ध्वनि का श्रवण किया था और फिर उस वराङ्गना को भी देखा था ।२७। उस सुन्दर अंगों वाली को देख कर दूसरी विद्युत् की लेखा के ही समान थी वह मदन नामक माया से परिपूर्ण महान् गत्तं में गिर गया था ।२८।

अथास्य मंत्रिणोऽभूवन्हृदये स्मरतापिताः ॥२६
तेन दैतेयनाथेन चिरं संप्राथिता सती ।
तैश्च संप्राथितास्ताश्च प्रतिशुश्रुवुरंजसा ॥३०
यास्त्वलभ्या महायज्ञैरश्वमेधादिकैरपि ।
ता लब्ध्वा मोहिनीमुख्या निर्वृतिं परमां ययुः ॥३१
विसस्मरुस्तदा वेदांस्तथा देवमुमापतिम् ।
विजहुस्ते तथा यज्ञक्रियाश्चान्याः शुभावहाः ॥३२
अवमानहतश्चासीत्तेषामपि पुरोहितः ।
मुहूर्त मिव तेषां तु ययावब्दायुतं तदा ॥३३
मोहितेष्वथ दैत्येषु सर्वे देवाः सवासवाः ।
विमुक्तोपद्रवा ब्रह्मन्नामोदं परमं ययुः ॥३४
कदाचिदथ देवेंद्रं वीक्ष्य सिंहासने स्थितम् ।
सर्वदेवैः परिवृतं नारदो मुनिराययौ ॥३५

इसके अनन्तर उसके मन्त्रीगण भी उनका स्मरण करने वाले के साथ ही थे ।२६। उस दैत्यों के स्वामी ने बहुत समय तक उस सती से प्रार्थना की थी । उनके द्वारा जब भली भाँति उनसे प्रार्थना की गयी थी तो उन्होंने भी तुरन्त ही प्रति श्रवण किया था ।३०। जो बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा जैसे अश्व मेधादिक यज्ञ हैं इनके द्वारा भी अलभ्य होती हैं उनको जिनमें मोहिनी मुख्य थी प्राप्त करके उनको बहुत ही अधिक आनन्द प्राप्त हुआ था ।३१। फिर तो उन सबने उस समय में भोग विलास के आनन्द में निमग्न होकर वेदों को भुला दिया था और उमापति देव का जो अर्चन था वह भी छोड़ दिया था । यज्ञादिक की जो भी अन्य परम शुभ के देने वाली क्रियाएं थी उनका भी परित्याग कर दिया था ।३२। फिर तो उनके जो