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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

के योग से किये जाते हैं। ब्रह्मा के अभिमन्यु वे वैकल्प से संप्रवृत्त होते
हैं।१०५।
इत्येते प्राकृताश्चैव वैकृताश्च नव स्मृताः ।
सर्गाः परस्परोत्पन्नाः कारणं तु बुधैः स्मृतम् ॥१०६
मूर्द्धानं वै यस्य वेदा वदंति वियन्नाभिश्चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे ।
दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौ क्षितिं च सोऽचिंत्यात्मा
सर्वभूत-णेता ॥१०७
वक्त्राद्यस्य ब्राह्मणाः संप्रसूता वक्षसश्चैव क्षत्रियाः पूर्वभागे
वैश्या ऊरुभ्यां यस्य पद्भ्यां च शूद्राः सर्वे वर्णा गात्रतः
संप्रसूताः ॥१०८
नारायणात्परोव्यक्तादंडमव्यक्तसंज्ञितम् ।
अंडजस्तु स्वयं ब्रह्मा लोकास्तेन कृताः स्वयम् ॥१०९
तत्र कल्पान् दश स्थित्वा सत्यं गच्छंति ते पुनः ।
ते लोका ब्रह्मलोकं वै अपरावर्तिनीं गतिम् ॥११०
आधिपत्यं विना ते वै ऐश्वर्येण तु तत्समाः ।
भवंति ब्रह्मणा तुल्या रूपेण विषयेण च ॥१११
तत्र ते ह्यवतिष्ठंते प्रीतियुक्ताः स्वसंयुताः ।
अश्वयं भाविनाथेन प्राकृतं तनुते स्वयम् ॥११२

ये इस प्रकार से प्राकृत और वैकृत नौ सर्ग कहे गये हैं। ये सर्ग पर-
स्पर में ही समुत्पन्न हुए हैं और बुधजनों ने तो कारण बताया है ।१०६। वेद
जिसके मूर्द्धा को कहते हैं—वियत इसकी नाभि है और चन्द्र तथा सूर्य
जिसके दोनों नेत्र हैं। दिशायें इसके श्रोत्र हैं, भूमिको इसके चरण समझिए—
वह न चिन्तन करने के योग्य आत्मा वाला और समस्त भूतों का प्रणेता है
।१०७। जिसके मुखसे ब्राह्मण समुत्पन्न हुए हैं और जिसके वक्षःस्थल से पूर्व
भाग में क्षत्रियों की समुत्पत्ति हुई है । जिसके ऊरुओं से वैश्य और पदों से
शूद्र समुद्भूत हुए हैं। सभी चारों वर्ण उसी के शरीर से उत्पन्न हुए हैं
।१०८। व्यक्त नारायण से पर अण्ड है जो अव्यक्त संज्ञा वाला है। इस अण्ड
से जन्म ग्रहण करने वाला स्वयं ब्रह्मा है और उसी के द्वारा स्वयं लोकों की