संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग वर्णन ] [ ३६
गन्धरूपरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम् ॥६
जगद्योनिम्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम् ।
विग्रहं सर्वभूतानामव्यक्तमभवत्किल ॥१०
अनाद्यंतमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवोप्ययम् ।
असांप्रतिकमज्ञेयं ब्रह्म यत्सदसत्परम् ॥११
तस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तमासीत्तमोमयम् ।
गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभातं तमोमयम् ॥१२
सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्राज्ञाधिष्ठितस्य वै ।
गुणभावादूभासमाने महातत्वं वभूव ह ॥१३
सूक्ष्म स तु महानग्रे अव्यक्तेन समावृतः ।
सत्वोद्रेको महानग्रे सत्वमात्रप्रकाशकः ॥१४
इस परमोत्तम भूतों के सर्ग को संयम से आरम्भ करने मैं बतला-
ऊँगा । जो अव्यक्त कारण है वह नित्य है और उसको स्वरूप सत् एवं जगत्
दोनों ही प्रकार का है ।८। तत्त्वों का चिन्तन करने वाले विचारक लोग उस
त्र्यम्बक को प्रधान तथा प्रकृति कहा करते हैं जो कि गन्ध-स्पर्श और रस
से रहित है तथा शब्द से भी विवर्जित हैं ।६। इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति
स्थान, महाभूत सनातन परब्रह्म तथा समस्त भूतों का विग्रह निश्चित रूप
से अव्यक्त हो गया था ।१०। आदि और अन्त से रहित अजन्मा, सूक्ष्म रूप
वाला सत्त्व-रज और तम-इन तीन गुणों से युक्त अर्थात् त्रिगुणात्मक, सबका
प्रभाव भी यह है जो असाम्प्रतिक, न जानने के योग्य, सत् और असत् स्वरूप
वाला, पर ब्रह्म है । जो सभी भूतों का निग्रह है वही अव्यक्त हो गया है ।
।११। उसी को आत्मा से यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है तम से परिपूर्ण है । उस
समय में उस गुणों (तीनों गुणों) के साम्य होने पर यह तमोमय विभात
नहीं होता है ।१२। जब सृजन का समय होता है उस काल में क्षेत्र के ज्ञाता
के द्वारा अधिष्ठित प्रधान के गुणों के भय से भासमान होने पर यह महा-
तत्व होगया था ।१३। आगे वह सूक्ष्म रूप वाला महान् अव्यक्त से समावृत
था । सत्त्व गुण की अधिकता से युक्त महान् केवल सत्त्व का ही प्रकाश करने
वाला था ।१४।
सत्वान्महान्स विज्ञेय एकस्तत्कारणः स्मृतः ।