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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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कृत्य-समुद्देश्य ] [ २३

यदुवंशसमुद्देशो हैहयस्य च विस्तरः ।
क्रोधादनन्तरं चोक्तस्तथा वंशस्य विस्तरः ॥१२१
ज्यामघस्य च माहात्म्यं प्रजासर्गश्च कीर्त्यते ।
देवावृधस्यांधकस्य धृष्टेश्चापि महात्मनः ॥१२२
अनिमित्रान्वययश्चैव विशोर्मिथ्याभिशंसनम् ।
विशोधमनुसंप्राप्तिर्मणिरत्नस्य धीमतः ॥१२३
सत्राजितः प्रजासर्गे राजर्षेर्देवमीढुषः ।
शूरस्य जन्म चाप्युक्तं चरितं च महात्मनः ॥१२४
कंसस्यापि च दौरात्म्यमेकीवंश्यात्समुद्भवः ।
वासुदेवस्य देवक्यां विष्णोरमिततेजसः ॥१२५
अनन्तरमृषेः सर्गप्रजासर्गोपवर्णनम् ।
देवासुरे समुत्पन्ने विष्णुना स्त्रीवधे कृते ॥१२६
संरक्षता शक्रवधं शापः प्राप्तः पुरा भृगोः ।
भृगुश्चोत्थापयामास दिव्यां शुक्रस्य मातरम् ॥१२७

निष्पादिक नृपों का पलाण्डु हरण आदि के द्वारा भूपति ययाति का भी सर्ग विस्तार पूर्वक कहा गया है ।१२०। राजा यदु के वंश का समुद्देश और हैहय का विस्तार बताया गया है । क्रोध के अनन्तर वंश का विस्तार कहा गया है ।१२१। ज्यामघ का माहात्म्य और उसकी प्रजाओं की उत्पत्ति कीर्त्तित की जाती है । देवा वृध—अन्धक और महान आत्मा वाले धृष्टि का वर्णन किया जाता है ।१२२। अनमित्र का वंश-वर्णन, तथा विश्रु का मिथ्या अभिशंसन और धीमान् मणिरत्न का विरोध तथा अनुसम्प्राप्ति बतायी गयी है ।१२३। राजर्षि देवमीढु के प्रजा के सर्ग में सत्राजित् और शूर का भी जन्म कहा है तथा इस महात्मा का चरित भी बताया गया है ।१२४। राजा कंस की दुरात्मता और एकीवंशत्व से समुत्पत्ति बतायी गयी है । वसुदेव का जन्म और देवकी के गर्भ से अपरिमित तेज वाले भगवान् विष्णु का आविर्भाव हुआ था ।१२५। इसके पश्चात् ऋषि का सर्ग है और प्रजाओं के सर्ग का उपवर्णन है । देवासुर के समुत्पन्न होने पर विष्णु भगवान् के द्वारा स्त्री का वध किये जाने पर ।१२६। इन्द्र के वध का संरक्षण करने वाले ने पहिले