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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १०७

उनके विपरीत समुत्पन्न हो जाते हैं। वृष्टि का अभाव-व्याधि-उपद्रव-मरण-
ये सब होते हैं ।१६। कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के दुःख
होते हैं और उन दुःखों के समुदाय से फिर मनों निर्वेद उत्पन्न हो जाता
है । यह सभी निस्सार है—ऐसा जब निर्वेद हृदयों में होता है तो फिर उन
प्राणियों के हृदयों में इन सब दुःखों से छुटकारा पाने का विचार होता है
।२०। ऐसी जब विचारणा होती है तो उससे सबके प्रति विरागता हो जाया
करती है और उस वैराग्य से भोगोपभोगों में दोषों का दर्शन होने लगता
है । दोषों के देखने से ही द्वापर में अज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है ।२१।

तेषामज्ञानिनां पूर्वमाद्ये स्वायंभुवेऽन्तरे ।
उत्पद्यंते हि शास्त्राणां द्वापरे परिपंथिनः ॥२२
आयुर्वेदविकल्पश्च ह्यङ्गानां ज्योतिषस्य च ।
अर्थशास्त्रविकल्पाश्च हेतुशास्त्रविकल्पनम् ॥२३
प्रक्रियाकल्पसूत्राणां भाष्यविद्याविकल्पनम् ।
स्मृतिशास्त्रप्रभेदश्च प्रस्थानानि पृथक्पृथक् ॥२४
द्वापरेष्वभिवर्त्तंते मतिभेदाश्चयान्नृणाम् ।
मनसा कर्मणा वाचा कृच्छ्राद्वार्त्ता प्रसिद्ध्यति ॥२५
द्वापरे सर्वभूतानां कायक्लेशपुरस्कृता ।
लोभो वृत्तिर्वणिक्पूर्वा तत्त्वानांमविनिश्चयः ॥२६
वेदशास्त्रप्रणयनं धर्माणां संकरस्तथा ।
वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामक्रोधौ तथैव च ॥२७
द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते रोगो लोभो वधस्तथा ।
वेदं व्यासश्चतुर्द्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥२८

उन ज्ञान से रहित मानवों से पहिले स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो कि
सबसे पहिला है उस द्वापर में सभी शास्त्रों के परिपन्थी अर्थात् विरोध
करने वाले लोग समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।२२। रोगों के विषय में आयु-
र्वेद शास्त्र का विकल्प और ज्योतिष शास्त्र का विकल्प-अर्थशास्त्र के विषय
में विकल्प और हेतु शास्त्र का विकल्प है ।२३। कल्पसूत्रों की प्रक्रिया, भाष्य
विद्या का विकल्प और स्मृति शास्त्रों के प्रभेद ऐसे अलग-अलग प्रस्थान हैं

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