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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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१०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

युग के जो स्वभाव हैं उनकी सन्ध्या पाद से बरता करती है। सन्ध्यापाद का
स्वभाव जो है वह अंश पाद से स्थित होता है ॥४२॥

चतुर्युगाख्यान वर्णनम्

सूत उवाच--अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विधिं पुनः ।
तत्र त्रेतायुगे क्षीणे द्वापरं प्रतिपद्यते ॥१
द्वापरादौ प्रजानां तु सिद्धिस्त्रेतायुगे तु या ।
परिवृत्ते युगे तस्मिंस्ततस्ताभिः प्रणश्यति ॥२
ततः प्रवर्तते तासां प्रजानां द्वापरे पुनः ।
संभेदश्चैव वर्णानां कार्याणां च विपर्ययः ॥३
यज्ञावधारणं दण्डो मदो दंभः क्षमा बलम् ।
एषा रजस्तमोयुक्ता प्रवृत्तिर्द्वापरे स्मृता ॥४
आद्ये कृते यो धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते ।
द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे ॥५
वर्णानां विपरिध्वंसः संकीर्यन्ते तथाश्रमाः ।
द्वैविध्यं प्रतिपद्येते युगे तस्मिञ्छुतिस्मृती ॥६
द्वैधात्तथा श्रुतिस्मृत्योर्निश्चयो नाधिगम्यते ।
अनिश्चयाधिगमनाद्धर्मतत्त्वं न विद्यते ॥७

श्री सूतजी ने कहा —उसके आगे फिर द्वापर युग की विधि का वर्णन
करूँगा। वहाँ पर त्रेता युग के क्षीण होने पर द्वापर युग प्रतिपन्न होता है
।१। द्वापर युग के आदि में प्रजाओं की वही सिद्धि थी जो कि त्रेतायुग में
में थी। उस युग के परिवर्तित हो जाने पर इसके पश्चात् उन सिद्धियों से
विनष्ट हो जाता है ।२। फिर द्वापर में उस प्रजाओं का संभेद प्रवृत्त हो जाता
है और समस्त वर्णों का और कार्यों का विपर्यय हो जाया करता है ।३। यज्ञों
का अवधारण, दण्ड, दम्भ, क्षमा और बल द्वापर में यह प्रवृत्ति जो भी थी
वह रजोगुण और तमोगुण से युक्त कही गयी है ।४। सबसे आदि में होने
वाले कृतयुग में जो धर्म है वह त्रेतायुग में प्रवृत्त होता है। द्वापर युग में वह
धर्म व्याकुलित होकर कलियुग में विनष्ट ही जाता है ।५। सभी वर्णों का
विशेष रूप से परिध्वंस होता है तथा सब आश्रम भी बिगड़ जाया करते