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सर्वकोश
ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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॥ ओ३म् ॥

विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव।

यद्भद्रं तन्न आ सुद। (यजुर्वेद अ० ३० मन्त्र ३)

इस पवित्र वेदवाणी द्वारा ईश्वर का सच्चा भक्त प्रेम से गदगद होकर प्रेममय प्रभु से प्रार्थना करता है— हे दयालु देव ! आप ही इस संसार के कर्ता—धर्ता और हर्ता हैं। मेरे सब दुर्गुण, दोष कुटेव (बुरी आदतें) तथा सब दुःखों को दूर करो। यही नहीं, किन्तु जितने सद्गुण (अच्छी आदतें) तुझ में हैं— मैं उन सबका भण्डार बन जाऊँ। जिससे सच्चे सुख और परमानन्द की प्राप्ति कर सकूँ।

किसी कवि ने कहा है —

हे जगदीश्वर दोष हमारे सगरे दूर भगादो।

जितने सद्गुण जगत् बीच हैं हमरे संग लगादो॥

हम औरों के दोष न देखें अपने दोष विचारें।

निन्दा करें न कभी किसी की यही एक गुण धारें॥

यदि संसार इस प्रार्थना के अनुसार चले तो शीघ्र ही स्वर्गधाम बन जाये। किन्तु बने कैसे ? जब बीज में ही दोष हो तो मीठे फल कहीं आकाश में से पककर आजाये ? भला चाहते हो तो ऋषियों की शरण में आओ और 'मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद' के अनुसार चलो। फिर देखो, आनन्द ही आनन्द है। धन्य हैं व सन्तान जिनके माता-पिता सदाचारी, विद्वान् और धार्मिक हैं जो गर्भाधान से लेकर पूरी विद्या होने तक धर्म और सदाचार का ही उपदेश और शिक्षा देते हैं। इतना ही नहीं, किन्तु पवित्र देवभूमि गुरुकुल में पूर्ण विद्वान्-धार्मिक और सदाचारी अध्यापक और गुरुओं द्वारा अपनी सन्तान को शिक्षा दिलाते हैं। तब जाकर बालक दुर्गुणों (बुरी आदतों) से बचकर धर्मात्मा और सुखी हो सकते हैं। नहीं तो कितने ही पापड़ बेलों, कुछ नहीं बनेगा। ये कच्चे बीज के फल पकने से पूर्व धड़ाम से नीचे गिर और सड़कर केवल दुःख का ही कारण होंगे, इनसे मिठास और स्वाद आये तथा शक्ति और बल प्राप्त हो, ऐसी आशा करना मूर्खता ही है।

हम लोगों के बच्चे भारत-माता की स्वाधीनता की रक्षा कर राम

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