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सर्वकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 380 में से

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पृष्ठ 8

भूमिका

ब्रह्मचर्य से लाभ और उसके न होने से हानि, प्रत्येक मनुष्य के अल्पाधिक अनुभव की बात है । इस विषय में पूर्ण अनुभव साधारणतः किसी को नहीं होता, क्योंकि जहाँ ब्रह्मचर्य की पूर्ण हानि होती है, वहाँ जीवन ही संभव नहीं है और जहाँ ब्रह्मचर्य का अखंड पालन होता हो, ऐसे ऊर्ध्वरेता महापुरुष के दर्शन दुर्लभ हैं । परंतु जो थोड़ा सा अनुभव प्रत्येक मनुष्य को इस विषय में होता है, उससे वह इस सत्य को जान सकता है कि “मरणं बिन्दु-पातेन, जीवनं बिन्दु-धारणात्”—जीव से ही जीवन है और उसके अभाव से मृत्यु । (यह बात वैयक्तिक जीवन में जितनी सत्य है, उतनी ही समाज के जीवन में भी, क्योंकि व्यक्तिों के समूह का ही नाम समाज है ।)

केवल भौतिक मृत्यु ही नहीं, सब प्रकार की मृत्यु “बिन्दु पात” से ही होती है—बिन्दुपात से बुद्धिअंश होता है, धैर्य नष्ट हो जाता है, सब प्रकार के उद्योग करने की शक्ति जादी रखती है । “बिन्दु-पात” ही सब प्रकार की अवनति का मूल है और इसीसे यह समझ लेना चाहिये—“बिन्दु-धारण” ही सब प्रकार की वृत्ति का साधन है । “सिद्धे विन्दुं महापाले, किं न स्रिष्यति