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सर्वकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 380 में से

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स्वास्थ्य की शिर्शायें

को स्थूल और सूक्ष्म का सूक्ष्म भोजन देना चाहिये। नियमित खाना-पीना स्थूल शरीर का, और सदाचार आदि सूक्ष्म का भोजन है।

५—ज्वर, खाँसी, लूथ आदि रोग स्थूल शरीर के, और काम, क्रोध, ईर्ष्या, अ्यात्म्य आदि सूक्ष्म शरीर के रोग हैं।

६—सात्विक भोजन स्थूल शरीर को नीरोग रखता है, और मन को सत्व गुणी बनाता है।

७—तामसी भोजन मन को तमोगुणी बनाता है।

८—परीपकार, दया, चमा, प्रेम, स्वार्थ-त्याग, स्वदेश और जाति-सेवा आदि उत्तम गुण मनुष्य को उन्नत बनाते, और शरीर को नीरोग रख कर आगु बढ़ाते हैं।

९—शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार का आरोग्य होने पर ही, आनन्द मिलता है; आगु बढ़ती है और प्रसिद्धा प्राप्त होती है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर एडवर्ड ड्यूई ने सदैव स्वस्थ रहने के लिये निम्नलिखित तीन नियम बतलाये हैं। इनका पालन करने वाला मनुष्य थोड़े ही दिनों में सत्यता की परीक्षा कर सकता है:—

( १ ) स्वच्छ वायु में दहलना और प्राणायाम साधना।

( २ ) स्वाभाविक श्रृंख लगने पर ही चचित मात्रा में भोजन करना।

( ३ ) प्रत्येक कचल को भली भाँति चबा-चबा कर खाना।