ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थधर्मका महत्त्व बताते हुए विवाहके लिये राजी
करना और नारदका पिताकी आज्ञा ले शिवलोकको जाना
सौति कहते हैं- नारदको इस प्रकार जाते
देख ब्रह्माजी उदास हो गये और इस प्रकार बोले।
ब्रह्माजीने कहा- अच्छी बात है। बेटा!
तुम तपस्याके लिये जाओ। अब संसारकी सृष्टि
करनेसे मेरा भी क्या प्रयोजन है? मैं सर्वेश्वर
श्रीकृष्णको जाननेके लिये गोलोकको जाऊँगा।
सनक, सनन्दन, सनातन तथा चौथा बेटा
सनत्कुमार- ये चारों वैरागी हैं ही। यति, हंसी,
आरुणि, वोढु तथा पञ्चशिख - ये सब पुत्र तपस्वी
हो गये। फिर संसारकी रचनासे मेरा क्या
प्रयोजन? मरीचि, अङ्गिरा, भृगु, रुचि, अत्रि,
कर्दम, प्रचेता, ऋतु और मनु- ये मेरे आज्ञापालक
हैं। समस्त पुत्रोंमें केवल वसिष्ठ ऐसे हैं, जो सदा
मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं। उपर्युक्त पुत्रोंके
सिवा अन्य सब-के-सब अविवेकी तथा मेरी
आज्ञासे बाहर हैं। ऐसी दशामें मेरा संसारकी
सृष्टिसे क्या प्रयोजन है? बेटा ! सुनो। मैं तुम्हें वेदोक्त
मङ्गलमय वचन सुना रहा हूँ। वह वचन परम्परा-
क्रमसे पालित होता आ रहा है तथा धर्म, अर्थ,
काम एवं मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है।
समस्त विद्वान् धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी
इच्छा रखते हैं; क्योंकि ये वेदोंमें विहित तथा
विद्वानोंकी सभाओंमें प्रशंसित हैं। वेदोंमें जिसका
विधान है वह धर्म है और जिसका निषेध है वह
अधर्म है। ब्राह्मणको चाहिये कि वह पहले
सुखपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करके फिर वेदोंका
अध्ययन करे। अध्ययन समाप्त होनेपर गुरुको
दक्षिणा दे। इसके बाद उत्तम कुलमें उत्पन्न एवं
परम विनीत स्वभाववाली कन्याके साथ विवाह
करे। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई नारी साध्वी तथा
पतिसेवामें तत्पर होती है। अच्छे कुलकी स्त्री कभी
उद्दण्ड नहीं हो सकती। पद्मरागमणिकी खानमें काँच
कैसे पैदा हो सकता है? नारद! नीच कुलमें
उत्पन्न हुई नारी ही माता-पिताके दोषसे उद्दण्ड
होती है। वही दुष्टा तथा सब कर्मोंमें स्वतन्त्र होती
है। बेटा ! सभी स्त्रियाँ दुष्ट नहीं होती हैं; क्योंकि
वे लक्ष्मीकी कलाएँ हैं। जो अप्सराओंके अंशसे
तथा नीच कुलमें उत्पन्न होती हैं, वे ही स्त्रियाँ
कुलटा हुआ करती हैं। साध्वी स्त्री गुणहीन
स्वामीकी सेवा एवं प्रशंसा करती है और कुलटा
सद्गुणशाली पतिकी भी सेवा नहीं करती। उलटे
उसकी निन्दा करती है। अतः साधुपुरुष प्रयत्नपूर्वक
उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ विवाह
करे। उसके गर्भसे अनेक पुत्रोंको जन्म देकर
वृद्धावस्थामें तपस्याके लिये जाय। आगमें निवास
करना उत्तम है, साँपके मुखमें तथा काँटेपर भी
रह लेना अच्छा है, परंतु मुँहसे दुर्वचन निकालनेवाली
स्त्रीके साथ निवास करना कदापि अच्छा नहीं
है। वह इन अग्नि, सर्प और कण्टकसे भी
अधिक दुःखदायिनी होती है। बेटा! मैंने तुम्हें
वेद पढ़ाया है। अब तुम मुझे यही गुरुदक्षिणा दो
कि विवाह कर लो। वत्स! तुम्हारी पूर्वजन्मकी
पत्नी मालती उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई है। तुम
किसी मङ्गलमय दिन और क्षणमें उसके साथ
विवाह करो। वह सती तुम्हें पानेके लिये ही
मनुवंशी संजयके घरमें जन्म लेकर भारतवर्षमें
तपस्या कर रही है। इस समय उसका नाम
रत्नमाला है। वह लक्ष्मीकी कला है। तुम उसे ग्रहण
करो। भारतवर्षमें लोगोंकी तपस्याका फल व्यर्थ नहीं
होता। मनुष्यको अध्ययनके पश्चात् पहले गृहस्थ होना
चाहिये, फिर वानप्रस्थ । तत्पश्चात् मोक्षके निमित्त
तपस्याका आश्रय लेना चाहिये। वेदमें यही क्रम
सुना गया है। श्रुतिमें यह भी सुना गया है कि
वैष्णवोंके लिये श्रीहरिकी पूजा ही तपस्या है। तुम
वैष्णव हो। अतः घरमें रहो और श्रीकृष्ण-चरणोंकी
अर्चना करो। बेटा ! जिसके भीतर और बाहर