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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 809

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९९
मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार श्लोक बतलाते हैं। परम
रुचिर अग्निपुराण पंद्रह हजार चार सौ श्लोकोंवाला
कहा गया है। पुराणप्रवर भविष्यमें चौदह हजार
पाँच सौ श्लोक बतलाये जाते हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें
अठारह हजार श्लोक हैं। विद्वज्जन इसे सभी पुराणोंका
सार बतलाते हैं। श्रेष्ठ लिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंका
है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार कही
गयी है। सज्जनोंने उत्तम स्कन्दपुराणको ग्यारह हजार
एक सौ अथवा इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंवाला
निरूपित किया है। पण्डितोंने वामनपुराणकी दस
हजार, कूर्मपुराणकी सतरह हजार और मत्स्यपुराणकी
चौदह हजार श्लोक-संख्या बतलायी है। गरुड़पुराण
उन्नीस हजार और उत्तम ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार
श्लोकोंवाला कहा गया है। इस प्रकार सभी पुराणोंकी
श्लोक-संख्या चार लाख बतलायी जाती है। इस प्रकार
पुराणवेत्ता लोग अठारह पुराण ही बतलाते हैं। इसी
तरह उपपुराणोंकी भी संख्या अठारह ही कही गयी है।
महाभारतको इतिहास कहते हैं। वाल्मीकीय
रामायण काव्य है और श्रीकृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण
पञ्चरात्रोंकी संख्या पाँच है। वासिष्ठ, नारदीय, कापिल,
गौतमीय और सनत्कुमारीय-ये ही पाँचों श्रेष्ठ पञ्चरात्र
हैं। संहिताएँ भी पाँच बतलायी जाती हैं; जो सभी
श्रीकृष्णकी भक्तिसे ओतप्रोत हैं। इनके नाम हैं-
ब्रह्मसंहिता, शिवसंहिता, प्रह्लादसंहिता, गौतमसंहिता
और कुमारसंहिता। शौनकजी ! इस प्रकार शास्त्रका
भण्डार तो बहुत बड़ा है, तथापि मैंने अपनी जानकारीके
अनुसार आपको क्रमशः पृथक्-पृथक् सब बतला
दिया है।
मुने ! साक्षात् भगवान् श्रीविष्णुने गोलोकस्थित
रासमण्डलमें अपने भक्त ब्रह्माको यह पुराण बतलाया
था। फिर ब्रह्माने धर्मात्मा धर्मको, धर्मने नारायणमुनिको,
नारायणने नारदको और नारदने मुझ भक्तको इसका
उपदेश किया। मुनिवर ! वही श्रेष्ठ पुराण इस समय
मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ। यह अभीप्सित
ब्रह्मवैवर्तपुराण परम दुर्लभ है। जो विश्वसमूहका
वरण करता है, जीवधारियोंका परमात्मस्वरूप है;
वही ब्रह्म कर्मनिष्ठोंके कर्मोंका साक्षीरूप है। उस
ब्रह्मका तथा उसकी अनुपम विभूतिका जिसमें विवरण
किया गया है; इसी कारण विद्वान्लोग इसे 'ब्रह्मवैवर्त'
कहते हैं। यह पुराण पुण्यप्रद, मङ्गलस्वरूप और
मङ्गलोंका दाता है। इसमें नये-नये अत्यन्त गोपनीय
रमणीय रहस्य भरे पड़े हैं। यह हरिभक्तिप्रद, दुर्लभ
हरिदास्यका दाता, सुखद, ब्रह्मकी प्राप्ति करनेवाला
साररूप और शोक-संतापका नाशक है।
जैसे सरिताओंमें शुभकारिणी गङ्गा तत्क्षण ही
मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, तीर्थोंमें पुष्कर और पुरियोंमें
काशी जैसे शुद्ध है, सभी वर्षोंमें जैसे भारतवर्ष
शुभ और तत्काल मुक्तिप्रद है, जैसे पर्वतोंमें सुमेरु,
पुष्पोंमें पारिजात-पुष्प, पत्रोंमें तुलसी-पत्र, व्रतोंमें
एकादशीव्रत, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, देवताओंमें श्रीकृष्ण,
ज्ञानिशिरोमणियोंमें महादेव, योगिन्द्रोंमें गणेश्वर, सिद्धेन्द्रोंमें
एकमात्र कपिल, तेजस्वियोंमें सूर्य, वैष्णवोंमें अग्रगण्य
भगवान् सनत्कुमार, राजाओंमें श्रीराम, धनुर्धारियोंमें
लक्ष्मण, देवियोंमें महापुण्यवती सती दुर्गा, श्रीकृष्णकी
प्रेयसियोंमें प्राणाधिका राधा, ईश्वरियोंमें लक्ष्मी तथा
पण्डितोंमें सरस्वती सर्वश्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार सभी
पुराणोंमें ब्रह्मवैवर्त श्रेष्ठ है। इससे विशिष्ट, सुखद,
मधुर, उत्तम पुण्यका दाता और संदेहनाशक दूसरा
कोई पुराण नहीं है। यह इस लोकमें सुखद, सम्पूर्ण
सम्पत्तियोंका उत्तम दाता, शुभद, पुण्यद, विघ्नविनाशक
और उत्तम हरि-दास्य प्रदान करनेवाला है तथा
परलोकमें प्रभूत आनन्द देनेवाला है।
पुत्रक ! सम्पूर्ण यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओंका
तथा समूची पृथ्वीकी प्रदक्षिणाका भी फल इसके
फलकी समतामें नगण्य है। चारों वेदोंके पाठसे भी
इसका फल श्रेष्ठ है। जो संयत-चित्त होकर इस पुराणको
श्रवण करता है; उसे गुणवान् विद्वान् वैष्णव पुत्र
प्राप्त होता है। यदि कोई दुर्भगा नारी इसे सुनती है
तो उसे पतिके सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इस पुराणके
श्रवणसे मृतवत्सा, काकबन्ध्या आदि पापिनी स्त्रियोंको
भी चिरजीवी पुत्र सुलभ हो जाता है। अपुत्रको पुत्र,
भार्यारहितको पत्नी और कीर्तिहीनको उत्तम यश मिल
जाता है। मूर्ख पण्डित हो जाता है। रोगी रोगसे,
बँधा हुआ बन्धनसे, भयभीत भयसे और आपत्तिग्रस्त
आपत्तिसे मुक्त हो जाता है। अरण्यमें, निर्जन मार्गमें
अथवा दावाग्निमें फँसकर भयभीत हुआ मनुष्य इसके