ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४५
होता रहता था। दिये हुए वचनके अनुसार उस
कटूक्तिकारिणी स्त्रीके अपराध पूरे हो गये।
दुर्वासामुनि यद्यपि स्वात्माराम और दयालु थे
तथापि क्रोधको नहीं छोड़ सके थे। उन्होंने
मोहवश पत्नीको शाप दे दिया—'अरी तू राखका
ढेर बन जा।' मुनिके संकेतमात्रसे वह जलकर
भस्म हो गयी। जो ऐसी उच्छृङ्खला स्त्रियाँ हैं,
उनका तीनों लोकोंमें कल्याण नहीं होता। शरीरके
भस्म हो जानेपर आत्माका प्रतिबिम्बरूप जीव
आकाशमें स्थित हो पतिसे विनयपूर्वक बोला।
जीवने कहा—हे नाथ! आप अपनी ज्ञान-
दृष्टिसे सदा सब कुछ देखते हैं। सर्वज्ञ होनेके
कारण आपको सब कुछका ज्ञान है। फिर मैं
आपको क्या समझाऊँ! उत्तम वचन, कटु वचन,
क्रोध, संताप, लोभ, मोह, काम, क्षुधा, पिपासा,
स्थूलता, कृशता, नाश, दृश्य, अदृश्य तथा उत्पन्न
होना—ये सब शरीरके धर्म हैं। न तो जीवके धर्म
हैं और न आत्माके ही। सत्त्व, रज और तम—
इन तीन गुणोंसे शरीर बना है। वह भी नाना
प्रकारका है। सुनिये, मैं आपको बताती हूँ।
किसी शरीरमें सत्त्वगुणकी अधिकता होती है,
किसीमें रजोगुणकी और किसीमें तमोगुणकी।
मुने! कहीं भी सम गुणोंवाला शरीर नहीं है। जब
सत्त्वगुणका उद्रेक होता है तब मोक्षकी इच्छा
जाग्रत् होती है, रजोगुणकी वृद्धिसे कर्म करनेकी
इच्छा प्रबल होती है और तमोगुणसे जीव-हिंसा,
क्रोध एवं अहंकार आदि दोष प्रकट होते हैं।
क्रोधसे निश्चय ही कटु वचन बोला जाता है। कटु
वचनसे शत्रुता होती है और शत्रुतासे मनुष्यमें
तत्काल अप्रियता आ जाती है। अन्यथा इस
भूतलपर कौन किसका शत्रु है? कौन प्रिय है
और कौन अप्रिय ? कौन मित्र है और कौन
वैरी ? सर्वत्र शत्रु और मित्रकी भावनामें इन्द्रियाँ
ही बीज हैं। स्त्रियोंके लिये पति प्राणोंसे भी
अधिक प्रिय है और पतिके लिये स्त्री प्राणोंसे
भी बढ़कर प्यारी है। फिर भी दुर्वचनके कारण
एक क्षणमें हम दोनोंके बीच तत्काल शत्रुता पैदा
हो गयी। प्रभो! जो बीत गया सो गया। यह सब
काम-दोषसे हुआ था। अब आप मेरा सारा
अपराध क्षमा कर दें और बतावें इस समय मुझे
क्या करना चाहिये। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ ?
कहाँ मेरा जन्म होगा? मैं तीनों लोकोंमें आपके
सिवा किसीकी भार्या नहीं होऊँगी।
यों कहकर कन्दलीका जीवात्मा मौन हो
गया। इधर शोकसे अचेत हो दुर्वासामुनि मूर्च्छित
हो गये। वे स्वात्माराम और महाज्ञानी होकर भी
अपनी चेतना खो बैठे। चतुर पुरुषोंके लिये
नारीका वियोग सब शोकोंसे बढ़कर होता है।
एक ही क्षणमें उन्हें चेत हुआ और वे अपने प्राण
त्याग देनेको उद्यत हो गये। उन्होंने वहीं योगासन
लगाकर वायुधारणा आरम्भ की। इतनेहीमें एक
ब्राह्मण-बालक वहाँ आ पहुँचा। उसके हाथमें
दण्ड और चक्र था। उसने लाल वस्त्र धारण
किया था और ललाटमें उत्तम चन्दन लगा रखा
था। उसकी अङ्गकान्ति श्याम थी। वह ब्रह्मतेजसे
जाज्वल्यमान था। उसकी अवस्था बहुत छोटी
थी; परंतु वह शान्त, ज्ञानवान् तथा वेदवेत्ताओंमें
श्रेष्ठ जान पड़ता था। उसे देख दुर्वासाने
वेगपूर्वक प्रणाम किया, वहीं बैठाया और
भक्तिभावसे उसका पूजन किया। ब्राह्मण वटुकने
मुनिको शुभाशीर्वाद दे वार्तालाप आरम्भ किया।
उसके दर्शन और आशीर्वादसे मुनिका सारा
दुःख दूर हो गया। वह नीतिविशारद
विचक्षण बालक क्षणभर चुप रहकर अमृतमयी
वाणीमें बोला।
शिशुने कहा—सर्वज्ञ विप्र ! आप गुरुमन्त्रके
प्रसादसे सब कुछ जानते हैं; फिर भी शोकसे कातर
हो रहे हैं; अतः मैं पूछता हूँ, इसका यथार्थ रहस्य
क्या है? ब्राह्मणोंका धर्म तप है। तपस्यासे तीनों
लोकोंको वशमें किया जा सकता है। मुने ! इस