ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मेरुके सबसे ऊपरी शिखरपर जरा-मृत्यु
आदिसे रहित ब्रह्मलोक है। उससे भी ऊपर
ध्रुवलोक है, जो सब ओरसे अत्यन्त मनोहर है।
जगदीश्वर ब्रह्माजीने उस पर्वतके निम्नभागमें सात
पातालोंका निर्माण किया। मुने! वे स्वर्गकी
अपेक्षा भी अधिक भोग-साधनोंसे सम्पन्न हैं और
क्रमशः एकसे दूसरे उत्तरोत्तर नीचे भागमें स्थित
हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-अतल, वितल,
सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल।
सबसे नीचे रसातल ही है। सात द्वीप, सात स्वर्ग
तथा सात पाताल- इन लोकोंसहित जो सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्माजीके ही अधिकारमें है।
शौनक! ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और
महाविष्णुके रोमाञ्च-विवरोंमें उनकी स्थिति है।
श्रीकृष्णकी मायासे प्रत्येक ब्रह्माण्डमें दिक्पाल,
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, देवता, मनुष्य आदि
सभी प्राणी स्थित हैं। इन ब्रह्माण्डोंकी गणना
करनेमें न तो लोकनाथ ब्रह्मा, न शङ्कर, न धर्म
और न विष्णु ही समर्थ हैं; फिर और देवता
किस गिनतीमें हैं? विप्रवर! कृत्रिम विश्व तथा
उसके भीतर रहनेवाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब
अनित्य तथा स्वप्नके समान नश्वर हैं। वैकुण्ठ,
शिवलोक तथा इन दोनोंसे परे जो गोलोक है, ये
सब नित्य-धाम हैं। इन सबकी स्थिति कृत्रिम
विश्वसे बाहर है। ठीक उसी तरह, जैसे आत्मा,
आकाश और दिशाएँ कृत्रिम जगत्से बाहर तथा
नित्य हैं।
(अध्याय ७)
सावित्रीसे वेद आदिकी सृष्टि, ब्रह्माजीसे सनकादिकी, सस्त्रीक स्वायम्भुव मनुकी,
रुद्रोंकी, पुलस्त्यादि मुनियोंकी तथा नारदकी उत्पत्ति, नारदको ब्रह्माका
और ब्रह्माजीको नारदका शाप
सौति कहते हैं- तदनन्तर सावित्रीने चार
मनोहर वेदोंको प्रकट किया। साथ ही न्याय और
व्याकरण आदि नाना प्रकारके शास्त्र-समूह तथा
परम मनोहर एवं दिव्य छत्तीस रागिनियाँ उत्पन्न
कीं। नाना प्रकारके तालोंसे युक्त छः सुन्दर राग
प्रकट किये। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलहप्रिय
कलियुग; वर्ष, मास, ऋतु, तिथि, दण्ड, क्षण
आदि; दिन, रात्रि, वार, संध्या, उषा, पुष्टि, मेधा,
विजया, जया, छः कृत्तिका, योग, करण,
कार्तिकेयप्रिया सती महाषष्ठी देवसेना- जो
मातृकाओंमें प्रधान और बालकोंकी इष्ट देवी हैं,
इन सबको भी सावित्रीने ही उत्पन्न किया। ब्राह्म,
पाद्म और वाराह- ये तीन कल्प माने गये हैं।
नित्य, नैमित्तिक, द्विपरार्ध और प्राकृत-ये चार
प्रकारके प्रलय हैं। इन कल्पों और प्रलयोंको तथा
काल, मृत्युकन्या एवं समस्त व्याधिगणोंको उत्पन्न
करके सावित्रीने उन्हें अपना स्तन पान कराया।
तदनन्तर ब्रह्माजीके पृष्ठदेशसे अधर्म उत्पन्न
हुआ। अधर्मके वामपार्श्वसे अलक्ष्मी उत्पन्न
हुई, जो उसकी पत्नी थी। ब्रह्माजीके नाभिदेशसे
शिल्पियोंके गुरु विश्वकर्मा हुए। साथ ही आठ
महावसुओंकी उत्पत्ति हुई, जो महान् बल-
पराक्रमसे सम्पन्न थे। तत्पश्चात् विधाताके मनसे
चार कुमार आविर्भूत हुए, जो पाँच वर्षकी
अवस्थाके-से जान पड़ते थे और ब्रह्मतेजसे
प्रज्वलित हो रहे थे। उनमेंसे प्रथम तो सनक थे,
दूसरेका नाम सनन्दन था, तीसरे सनातन और
चौथे ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार थे। इसके
बाद ब्रह्माजीके मुखसे सुवर्णके समान कान्तिमान्
कुमार उत्पन्न हुआ, जो दिव्यरूपधारी था। उसके