ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 491, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८१
नन्दका शिशु श्रीकृष्णको लेकर वनमें गो-चारणके लिये जाना, श्रीराधाका
आगमन, नन्दसे उनकी वार्ता, शिशु कृष्णको लेकर राधाका एकान्त वनमें
जाना, वहाँ रत्नमण्डपमें नवतरुण श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव, श्रीराधा-कृष्णकी
परस्पर प्रेमवार्ता, ब्रह्माजीका आगमन, उनके द्वारा श्रीकृष्ण और
राधाकी स्तुति, वर-प्राप्ति तथा उनका विवाह कराना, नवदम्पतिका
प्रेम-मिलन तथा आकाशवाणीके आश्वासन देनेपर शिशुरूपधारी
श्रीकृष्णको लेकर राधाका यशोदाजीके पास पहुँचाना
भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! एक | थी। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी
दिन नन्दजी श्रीकृष्णको साथ लेकर वृन्दावनमें | आभाको छीने लेता था। नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें
गये और वहाँ भाण्डीर उपवनमें गौओंको चराने | खिले हुए कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे
लगे। उस भूभागमें स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलसे | थे। दोनों आँखोंमें तारा, बरौनी तथा अञ्जनसे
भरा हुआ एक सरोवर था। नन्दजीने गौओंको | विचित्र शोभाका विस्तार हो रहा था। उनकी
उसका जल पिलाया और स्वयं भी पीया। इसके | नासिका पक्षिराज गरुड़की चोंचकी मनोहर सुषमाको
बाद वे बालकको गोदमें लेकर एक वृक्षकी | लज्जित कर रही थी। उस नासिकाके मध्यभागमें
जड़के पास बैठ गये। मुने ! इसी समय मायासे | शोभनीय मोतीकी बुलाक उज्ज्वल आभाकी सृष्टि
मानव-शरीर धारण करनेवाले श्रीकृष्णने अपनी | कर रही थी। केश-कलापोंकी वेणीमें मालतीकी
मायाद्वारा अकस्मात् आकाशको मेघमालासे | माला लिपटी हुई थी। दोनों कानोंमें ग्रीष्म-ऋतुके
आच्छादित कर दिया। नन्दजीने देखा - आकाश | मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत करनेवाले
बादलोंसे ढक गया है। वनका भीतरी भाग और | कान्तिमान् कुण्डल झलमला रहे थे। दोनों ओठ
भी श्यामल हो गया है। वर्षाके साथ जोर-जोरसे | पके बिम्बाफलकी शोभाको चुराये लेते थे।
हवा चलने लगी है। बड़े जोरकी गड़गड़ाहट हो | मुक्तापंक्तिकी प्रभाको फीकी करनेवाली दाँतोंकी
रही है। वज्रकी दारुण गर्जना सुनायी देती है। | पंक्ति उनके मुखकी उज्ज्वलताको बढ़ा रही थी।
मूसलधार पानी बरस रहा है और वृक्ष काँप रहे | मन्द मुस्कान कुछ-कुछ खिले हुए कुन्द-
हैं। उनकी डालियाँ टूट-टूटकर गिर रही हैं। यह | कुसुमोंकी सुन्दर प्रभाका तिरस्कार कर रही थी।
सब देखकर नन्दको बड़ा भय हुआ। वे सोचने | कस्तूरीकी बिन्दुसे युक्त सिन्दूरकी बेंदी भालदेशको
लगे- 'मैं गौओं तथा बछड़ोंको छोड़कर अपने | विभूषित कर रही थी। शोभाशाली कपालपर
घरको कैसे जाऊँगा और यदि घरको नहीं जाऊँगा | मल्लिका-पुष्प धारण करके सती राधा बड़ी सुन्दरी
तो इस बालकका क्या होगा ?' नन्दजी इस प्रकार | दिखायी देती थीं। सुन्दर, मनोहर एवं गोलाकार
कह ही रहे थे कि श्रीहरि उस समय जलकी | कपोलपर रोमाञ्च हो आया था। उनका वक्षःस्थल
वर्षाके भयसे रोने लगे। उन्होंने पिताके कण्ठको | मणिरत्नेन्द्रके सारतत्त्वसे निर्मित हारसे विभूषित
जोरसे पकड़ लिया। | था। उनका उदर गोलाकार, सुन्दर और अत्यन्त
इसी समय राधा श्रीकृष्णके समीप आयीं। | मनोहर था। विचित्र त्रिवलीकी शोभासे सम्पन्न
वे अपनी गतिसे राजहंस तथा खञ्जनके गर्वका | दिखायी देता था। उनकी नाभि कुछ गहरी थी।
गंजन कर रही थीं। उनकी आकृति बड़ी मनोहर | कटिप्रदेश उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मेखला-