ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तुम्हारी प्रेयसी राधिका हूँ तथा हम दोनोंका
प्रेम सौभाग्य शाश्वत है। प्रभो! यह उत्तम वर मुझे
अवश्य दो। जैसे शरीर छायाके साथ और प्राण
शरीरके साथ रहते हैं, उसी प्रकार हम दोनोंका
जन्म एवं जीवन एक-दूसरेके साथ बीते। विभो!
यह श्रेष्ठ वर मुझे दे दो। भगवन्! भूतलपर
पहुँचकर भी कहीं हम दोनोंका पलभरके लिये
भी वियोग न हो। यह वर मुझे दो। हरे! मेरे
प्राणोंसे ही तुम्हारा शरीर निर्मित हुआ है- मेरे
प्राण तुम्हारे श्रीअङ्गोंसे विलग नहीं हैं। मेरी इस
धारणाका कौन निवारण कर सकता है? मेरे
शरीरसे ही तुम्हारी मुरली बनी है और मेरे मनसे
ही तुम्हारे चरणोंका निर्माण हुआ है। तात्पर्य यह
है कि मैं तुम्हारी मुरलीको अपना शरीर मानती
हूँ और मेरा मन तुम्हारे चरणोंसे कभी विलग
नहीं होता है। संसारमें कितने ही ऐसे स्त्री-पुरुष
हैं, जो सामने एक-दूसरेकी स्तुति करते हैं; परंतु
कहीं भी अपने प्रियतममें निरन्तर आसक्त रहनेवाली
मुझ-जैसी प्रेयसी नहीं है। तुम्हारे शरीरके आधे
भागसे किसने मेरा निर्माण किया है? हम दोनोंमें
भेद है ही नहीं। अतः मेरा मन निरन्तर तुम्हींमें
लगा रहता है। मेरी आत्मा, मेरा मन और मेरे प्राण
जिस तरह तुममें स्थापित हैं, उसी तरह तुम्हारे
मन, प्राण और आत्मा भी मुझमें ही स्थापित हैं।
अतः विरहकी बात कानमें पड़ते ही आँखोंका
पलक गिरना बंद हो गया है और हम दोनों
आत्माओंके मन, प्राण निरन्तर दग्ध हो रहे हैं।
श्रीकृष्ण बोले- देवि! उत्तम आध्यात्मिक
योग शोकका उच्छेद करनेवाला होता है। अतः
उसे बताता हूँ, सुनो। यह योग योगीन्द्रोंके लिये
भी दुर्लभ है। सुन्दरि ! देखो, सारा ब्रह्माण्ड
आधार और आधेयके रूपमें विभक्त है। इनमें भी
आधारसे पृथक् आधेयकी सत्ता सम्भव नहीं है।
फलका आधार है फूल, फूलका आधार है पल्लव,
पल्लवका आधार है तना या डाली तथा उसका भी
आधार स्वयं वृक्ष है। वृक्षका आधार अंकुर है,
जो बीजकी शक्तिसे सम्पन्न होता है। उस
अंकुरका आधार बीज है, बीजका आधार पृथ्वी
है, पृथ्वीके आधार शेषनाग हैं। शेषके आधार
कच्छप हैं, कच्छपका आधार वायु है और
वायुका आधार मैं हूँ। मेरी आधारस्वरूपा तुम हो;
क्योंकि मैं सदा तुममें ही स्थित रहता हूँ। तुम
शक्तियोंका समूह और मूलप्रकृति ईश्वरी हो।
शरीररूपिणी तथा त्रिगुणाधार-स्वरूपिणी भी तुम्हीं
हो। मैं तुम्हारा आत्मा निरीह हूँ। तुम्हारा संयोग
प्राप्त करके ही चेष्टावान् होता हूँ। शरीरके बिना
आत्मा कहाँ? और आत्माके बिना शरीर कहाँ?
देवि! शरीर और आत्मा दोनोंकी प्रधानता है।
बिना दोके संसार कैसे चल सकता है? राधे! हम
दोनोंमें कहीं भेद नहीं है; जहाँ आत्मा है, वहाँ
शरीर है। वे दोनों एक-दूसरेसे अलग नहीं हैं।
जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति,
पृथ्वीमें गन्ध और जलमें शीतलता है, उसी तरह
तुममें मेरी स्थिति है। धवलता और दुग्धमें,
दाहिका शक्ति और अग्निमें, पृथ्वी और गन्धमें
तथा जल और शीतलतामें जैसे ऐक्य (भेदाभाव)
है, उसी तरह हम दोनोंमें भेद नहीं है। मेरे बिना
तुम निर्जीव हो और तुम्हारे बिना मैं अदृश्य हूँ।
सुन्दरि ! तुम्हारे बिना मैं संसारकी सृष्टि नहीं कर
सकता, यह निश्चित बात है। ठीक उसी तरह,
जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता
और सुनार सोनेके बिना आभूषणोंका निर्माण
नहीं कर सकता। स्वयं आत्मा जैसे नित्य है,
उसी प्रकार साक्षात् प्रकृतिस्वरूपा तुम नित्य
हो। तुममें सम्पूर्ण शक्तियोंका समाहार सञ्चित
है। तुम सबकी आधारभूता और सनातनी हो*।
- यथा क्षीरे च धावल्यं दाहिका च हुताशने । भूमौ गन्धो जले शैत्यं तथा त्वयि मम स्थितिः ॥
धावल्यदुग्धयोरैक्यं दाहिकानलयोस्तथा । भूगन्धजलशैत्यानां नास्ति भेदस्तथाऽऽवयोः ॥