ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वारका संरक्षण करती थीं। उन सबकी वेश-
भूषा अवर्णनीय थी। वे नाना प्रकारके सद्गुणोंसे
युक्त, रूप-यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय अलंकारोंसे
विभूषित थीं। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा नूपुर
धारण किये हुए थीं। उनके कटिप्रदेश श्रेष्ठ रत्नोंकी
बनी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंसे अलंकृत थे। रत्ननिर्मित
युगल कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलोंकी बड़ी शोभा
हो रही थी। प्रफुल्ल मालतीकी मालाओंसे उनके
वक्षःस्थलका मध्यभाग उद्भासित हो रहा था।
उनके मुख-चन्द्र शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाओंकी प्रभाको
छीने लेते थे। पारिजातके पुष्पोंकी मालाओंसे
उनके सुरम्य केशपाश आवेष्टित थे। वे भाँति-
भाँतिके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थीं। पके
बिम्बफलके समान उनके लाल-लाल ओठ थे।
मुखारविन्दोंपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही
थी। पके अनारके दानोंकी भाँति दन्तपंक्तियाँ
उनकी शोभा बढ़ा रही थीं। मनोहर चम्पाके
समान गौरवर्णवाली उन गोपकिशोरियोंके कटिभाग
अत्यन्त कृश थे। उनकी नासिकाओंमें गजमुक्ताकी
बुलाकें शोभा दे रही थीं। वे नासिकाएँ पक्षिराज
गरुड़की सुन्दर चोंचकी शोभा धारण करती थीं।
उनका चित्त नित्य मुकुन्दके चरणारविन्दोंमें लगा
था। द्वारपर खड़े हुए निमेषरहित देवताओंने उन
सबको देखा। वह द्वार श्रेष्ठ मणिरत्नोंकी वेदिकाओंसे
सुशोभित था। इन्द्रनीलमणिके बहुत-से खम्भे
उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके बीच-बीचमें
सिन्दूरी रंगकी लाल मणियाँ जड़ी थीं। उस
द्वारको पारिजात-पुष्पोंकी मालाओंसे सजाया
गया था। उन्हें छूकर बहनेवाली वायु वहाँ
सर्वत्र सुगन्ध फैला रही थी। राधिकाके उस
परम आश्चर्यमय अन्तःपुरके द्वारका अवलोकन
करके देवताओंके मनमें श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके
दर्शनकी उत्कण्ठा जाग उठी। उन्होंने उन
सखियोंसे पूछकर शीघ्र ही द्वारके भीतर प्रवेश
किया। उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था।
भक्तिके उद्रेकसे उनकी आँखें भर आयी थीं।
उनके मुख और कंधे कुछ-कुछ झुक गये थे।
अब देवताओंने श्रीराधिकाके उस श्रेष्ठ
अन्तःपुरको अत्यन्त निकटसे देखा। समस्त मन्दिरोंके
मध्यभागमें एक मनोहर चतुःशाला थी, जिसकी
रचना बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे की गयी थी।
भाँति-भाँतिके हीरक-जटित मणिमय स्तम्भ उसकी
शोभा बढ़ा रहे थे। पारिजात-पुष्पोंकी मालाओंकी
झालरोंसे उसे सजाया गया था। मोती, माणिक्य,
श्वेत चँवर, दर्पण तथा बहुमूल्य रत्नोंके सारतत्त्वसे
बने हुए कलश उस चतुःशालाको विभूषित कर
रहे थे। रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दन-पल्लवोंकी
बन्दनवारसे विभूषित मणिमय स्तम्भ-समूह उसके
प्राङ्गणको रमणीय बना रहे थे। चन्दन, अगुरु,
कस्तूरी तथा कुंकुमके द्रवका वहाँ छिड़काव
हुआ था। श्वेत धान्य, श्वेत पुष्प, मूँगा, फल,
अक्षत, दूर्वादल और लाजा आदिके निर्मञ्छन
(निछावर)-से उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी।
फल, रत्न, रत्नकलश, सिन्दूर, कुंकुम और पारिजातकी
मालाओंसे उसको सजाया गया था। फूलोंकी
सुगन्धसे सुवासित वायु उस स्थानको सब ओरसे
सौरभयुक्त बना रही थी। जो सर्वथा अनिर्वचनीय,
अनिरूपित और ब्रह्माण्डमात्रमें दुर्लभ द्रव्य एवं
वस्तुएँ थीं, उन्हींसे उस भव्य भवनको विभूषित
किया गया था। वहाँ अत्यन्त सुन्दर रत्नमयी
शय्या बिछी थी, जिसपर महीन एवं कोमल
वस्त्रोंका बिछावन था। नारद! करोड़ों रत्नमय
कलश तथा रत्ननिर्मित पात्र वहाँ सजाकर रखे गये
थे, जो बहुमूल्य होनेके साथ ही बहुत सुन्दर थे।
उनसे उस चतुःशालाकी बड़ी शोभा हो रही थी।
नाना प्रकारके वाद्योंकी मधुर ध्वनि वहाँ गूँज रही
थी। वीणा आदिके स्वर-यन्त्रोंके साथ गोपियोंका
सुमधुर गीत सुनायी पड़ता था। मृदंग तथा
अन्यान्य वाद्योंकी ध्वनिसे वह स्थान बड़ा मोहक
जान पड़ता था। श्रीकृष्ण-तुल्य रूप, रंग और