ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
खेतीसे हरी-भरी भूमि, लाखों उत्तमोत्तम गजराज,
सोनेके आभूषणोंसे विभूषित तीन लाख रत्न,
सहस्रों स्वर्णजटित रथरत्न, एक लाख शिबिका,
अन्नसे भरे हुए तीन करोड़ सुवर्णपात्र, जलसे भरे
हुए तीन कोटि सुवर्ण-कलश, कर्पूर आदिसे
सुवासित ताम्बूल और विश्वकर्माद्वारा रचित तथा
श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे खचित एवं वह्निशुद्ध
विचित्र वस्त्रसहित माल्यसमूहोंसे सुशोभित तीन
करोड़ विचित्र स्वर्ण-पर्यङ्कका ब्राह्मणोंके लिये
दान किया था। भगवान् शंकरसे परम दुर्लभ
ज्ञान, श्रीकृष्णका मन्त्र तथा श्रीहरिका दास्यभाव
प्राप्त करके वे गोलोकको चले गये। अपने पुत्रको
मुक्त हुआ देख प्रजापति ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए।
उन्होंने संतुष्ट होकर भगवान् शंकरकी स्तुति की
और आदिमनुके स्थानपर दूसरे मनुकी सृष्टि की।
वे भी स्वयम्भूके पुत्र होनेके कारण स्वायम्भुव
मनु कहलाये। दूसरे मनुका नाम स्वारोचिष है।
ये अग्निदेवके पुत्र हैं। राजा स्वारोचिष भी
स्वायम्भुव मनुके समान ही महान् धर्मिष्ठ एवं
दानी रहे हैं। दो अन्य मनु राजा प्रियव्रतके पुत्र
तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नाम हैं-तापस
और उत्तम। दोनों ही वैष्णव हैं तथा क्रमशः
तीसरे और चौथे मनुके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे
दोनों भी भगवान् शंकरके शिष्य हैं तथा
श्रीकृष्णकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं। धर्मात्माओंमें
श्रेष्ठ रैवत पाँचवें मनु हैं। चाक्षुषको छठा मनु
जानना चाहिये। वे भी विष्णुभक्तिमें तत्पर
रहनेवाले हैं। सूर्यपुत्र श्राद्धदेव जो विष्णुके भक्त
हैं, सातवें मनु कहे गये हैं (इन्हींको वैवस्वत मनु
कहते हैं)। सूर्यके दूसरे वैष्णव पुत्र सावर्णिक
आठवें मनु हैं। विष्णुव्रतपरायण दक्षसावर्णि नवें
मनु हैं। ब्रह्मज्ञानविशारद ब्रह्मसावर्णि दसवें मनु
हैं। ग्यारहवें मनुका नाम धर्मसावर्णि है। वे
धर्मिष्ठ, वरिष्ठ तथा सदा ही वैष्णवोंके व्रतका
पालन करनेवाले हैं। ज्ञानी रुद्रसावर्णि बारहवें
मनु हैं तथा धर्मात्मा देवसावर्णिको तेरहवाँ मनु
कहा गया है। महाज्ञानी चन्द्रसावर्णि चौदहवें मनु
हैं। मनुओंकी जितनी आयु होती है, उतनी ही
इन्द्रोंकी भी होती है।
ब्रह्माका एक दिन चौदह इन्द्रोंसे अविच्छिन्न
कहा जाता है। जितना बड़ा उनका दिन होता है,
उतनी ही बड़ी उनकी रात भी होती है। नरेश्वर !
उसे ब्राह्मी निशाके नामसे जानना चाहिये।
उसीको वेदोंमें 'कालरात्रि' कहा गया है। राजन् !
ब्रह्माका एक दिन एक छोटा कल्प माना गया है।
महातपस्वी मार्कण्डेय ऐसे ही कल्पोंसे सात
कल्पतक जीवित रहते हैं। ब्रह्माका दिन बीतनेपर
ब्रह्मलोकसे नीचेके सारे लोक प्रलयाग्निसे जलकर
भस्म हो जाते हैं। वह अग्नि सहसा संकर्षण
(शेषनाग) -के मुखसे प्रकट होती है। उस समय
चन्द्रमा, सूर्य और ब्रह्माजीके पुत्रगण निश्चय ही
ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। जब ब्रह्माकी रात बीत
जाती है, तब वे पुनः सृष्टिका कार्य प्रारम्भ करते
हैं। ब्रह्माकी रात्रिमें जो लोकोंका संहार होता है,
उसे 'क्षुद्र प्रलय' कहते हैं। उसमें देवता, मनु
और मनुष्य आदि दग्ध हो जाते हैं। इस प्रकार
जब ब्रह्माके तीस दिन-रात व्यतीत हो जाते हैं,
तब उनका एक मास पूरा होता है। वैसे ही बारह
महीनोंका उनका एक वर्ष होता है। इस प्रकार
ब्रह्माके पंद्रह वर्ष व्यतीत होनेपर एक प्रलय
होता है, जिसे वेदोंमें 'दैनन्दिन प्रलय' कहा गया
है। प्राचीन वेदज्ञोंने उसीको 'मोहरात्रि' की संज्ञा
दी है। उसमें चन्द्रमा, सूर्य आदि; दिक्पाल,
आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, इन्द्र, मानव, ऋषि,
मुनि, गन्धर्व तथा राक्षस आदि; मार्कण्डेय,
लोमश और पेचक आदि चिरजीवी; राजा इन्द्रद्युम्न,
अकूपार नामक कच्छप तथा नाडीजंघ नामक
बक-ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मलोकके
नीचेके सब लोक तथा नागोंके स्थान
भी विनाशको प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे समयमें