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सर्वकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 486 में से

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पृष्ठ 99

९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

होती है। अतः वे योगीकी भाँति एक ही कालमें अनेक शरीर धारण
करके अनेक स्थानोंमें एक साथ उनके लिये समर्पित की हुई हविको
ग्रहण कर सकते हैं। शास्त्रमें भी देवताओंके सम्बन्धमें ऐसा वर्णन देखा
जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (३।९।१-२)-में एक प्रसंग आता है,
जिसमें शाकल्य तथा याज्ञवल्क्यका संवाद है। शाकल्यने पूछा—'देवता
कितने हैं?' याज्ञवल्क्य बोले—'तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन
सहस्र।' फिर प्रश्न हुआ—'कितने देवता हैं?' उत्तर मिला—'तैंतीस।'
बार-बार प्रश्नोत्तर होनेपर अन्तमें याज्ञवल्क्यने कहा—'ये सब तो इनकी
महिमा हैं अर्थात् ये एक-एक ही अनेक हो जाते हैं। वास्तवमें देवता
तैंतीस ही हैं' इत्यादि। इस प्रकार श्रुतिने देवताओंमें अनेक रूप धारण
करनेकी शक्तिका वर्णन किया है। योगियोंमें भी ऐसी शक्ति देखी जाती
है; इसलिये कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—देवताओंको शरीरधारी माननेसे उन्हें विनाशशील मानना
पड़ेगा; ऐसी दशामें वेदोंमें जिन-जिन देवताओंका वर्णन आता है,
उनकी नित्यता नहीं सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं
प्रमाणभूत नहीं माना जा सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी
जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥
चेत् = यदि कहो; शब्दे = (देवताको शरीरधारी माननेपर) वैदिक
शब्दमें विरोध आता है; इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः
प्रभवात् = क्योंकि इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्‌की उत्पत्ति
होती है; प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात प्रत्यक्ष (वेद) और अनुमान
(स्मृति) दोनों प्रमाणोंसे सिद्ध होती है।
व्याख्या—“देवताओंमें अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे
कर्ममें विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परंतु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त
शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमें विरोध आयेगा; क्योंकि