वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३० ] अध्याय १ ७३
फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोंको परम लाभ पहुँचानेके लिये
भगवान् मनुष्य आदिके रूपमें भी समय-समयपर प्रकट होते हैं। यह बात
उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोंसे भी
प्रमाणित है। इस कारण विराट्रूपमें उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार
तथा देश-विशेषसे सम्बन्धित माननेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि वह
सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देश-कालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी
है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है।
यह बात माण्डूक्योपनिषद्में परब्रह्म परमात्माके चार पादोंका वर्णन करके
भलीभाँति समझायी गयी है।
सम्बन्ध — अब इस विषयमें बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं—
अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १।२।३०॥
अनुस्मृतेः = विराट्रूपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उसको
देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमें; (अविरोधः = ) कोई विरोध नहीं है; (इति = )
ऐसा; बादरिः = बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
व्याख्या — परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत हैं तो भी उनका
निरन्तर भजन, ध्यान और स्मरण करनेके लिये उन्हें देश-विशेषमें
स्थित विराट्स्वरूप मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है,
क्योंकि भगवान् सर्वसमर्थ हैं। उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमें
चिन्तन करते हैं, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी-उसी रूपमें
उनको मिलते हैं। *
- श्रीमद्भागवतमें भी ऐसा ही कहा गया है—
यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (३।९।११)
'महान् यशस्वी परमेश्वर ! आपके भक्तजन अपने हृदयमें आपको जिस-जिस
रूपमें चिन्तन करते हैं, आप उन संत-महानुभावोंपर अनुग्रह करनेके लिये वही-
वही शरीर धारण कर लेते हैं।'