वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
व्याख्या-ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमें ईक्षणका कर्ता
आत्माको बताया गया है; अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध
प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता। इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण
मानना वेदके अनुकूल नहीं है।
सम्बन्ध- 'आत्म' शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये
भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें 'आत्मा' को गौणरूपसे प्रकृतिका वाचक
मानकर उसे जगत्का कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर
कहते हैं-
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १।१।७॥
तन्निष्ठस्य = उस जगत्कारण (परमात्मा)-में स्थित होनेवालेकी;
मोक्षोपदेशात् = मुक्ति बतलायी गयी है; इसलिये (वहाँ प्रकृतिको
जगत्कारण नहीं माना जा सकता)।
व्याख्या-तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी वल्लीके सातवें अनुवाकमें जो
सृष्टिका प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'तदात्मानं स्वय-
मकुरुत' - 'उस ब्रह्मने स्वयं ही अपने-आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के
रूपमें प्रकट किया।' साथ ही यह भी बताया गया है कि 'यदा ह्येवैष
एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं
गतो भवति' । 'यह जीवात्मा जब उस देखनेमें न आनेवाले, अहंकाररहित,
न बतलाये जानेवाले, स्थानरहित आनन्दमय परमात्मामें निर्भय निष्ठा करता
है- अविचलभावसे स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है।' इसी
प्रकार छान्दोग्योपनिषद्में भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम
कारणमें स्थित होनेका फल मोक्ष बताया है; किंतु प्रकृतिमें स्थित होनेसे मोक्ष
होना कदापि सम्भव नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका
वाचक नहीं है, इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध-उक्त श्रुतिमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक
नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं-