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सर्वकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 486 में से

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पृष्ठ 226

सूत्र २६-२७ ] अध्याय २ २२३
सम्बन्ध — गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं—
व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥
गन्धवत् = गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः = गुणका गुणीसे अलग होना बन
सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)।
व्याख्या — यहाँ यह शंका भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके
साथ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता
है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमें
फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग
होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध — इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं—
तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥
तथा = ऐसा; च = ही; दर्शयति = श्रुति भी दिखलाती है।
व्याख्या — केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं;
श्रुतिमें भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमें
नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है। * अतः यह सिद्ध होता है
कि आत्मा अणु है।
सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें
सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किंतु उसमें दी हुई
युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो
आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन
करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है—

  • स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यः । (बृह० उ० १।४।७)
    तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥
    (छा० उ० ८।८।१)