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सर्वकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 486 में से

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पृष्ठ 199

१९६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
चाहिये। तात्पर्य यह कि क्षणिकवाद और विज्ञानवादका जिन युक्तियोंसे
खण्डन किया गया है, उन्हींके द्वारा सर्वशून्यवादका भी खण्डन हो गया;
ऐसा मानना चाहिये।
सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धमतका निराकरण करके अब जैनमतका खण्डन
करनेके लिये नया प्रकरण आरम्भ करते हैं। जैनीलोग सप्तभंगी-न्यायके
अनुसार एक ही पदार्थकी सत्ता और असत्ता दोनों स्वीकार करते हैं, उनकी
इस मान्यताका निराकरण करनेके लिये सूत्रकार कहते हैं—
नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥ २ । २ । ३३ ॥
एकस्मिन् = एक सत्य पदार्थमें; न = परस्पर-विरुद्ध अनेक धर्म नहीं रह
सकते; असम्भवात् = क्योंकि यह असम्भव है।
व्याख्या—जैनीलोग सात पदार्थ १ और पंच अस्तिकाय २ मानते हैं और
सर्वत्र सप्तभंगी-न्यायकी अवतारणा करते हैं। उनकी मान्यताके अनुसार
सप्तभंगी-न्यायका स्वरूप इस प्रकार है—१ स्यादस्ति (पदार्थकी सत्ता है),
२ स्यान्नास्ति (प्रकारान्तरसे पदार्थकी सत्ता नहीं है), ३ स्यादस्ति च नास्ति
च (हो सकता है कि पदार्थकी सत्ता हो भी और न भी हो), ४ स्यादवक्तव्यः
(सम्भव है, वस्तुका स्वरूप कहने या वर्णन करनेयोग्य न हो), ५ स्यादस्ति
चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, पर वह वर्णन करनेयोग्य न
हो), ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च (सम्भव है, वस्तुकी सत्ता भी न हो और
वह वर्णन करनेयोग्य भी न हो) तथा ७ स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च
(सम्भव है, वस्तुकी सत्ता हो, न भी हो और वह वर्णन करनेयोग्य भी न
१-उनके बताये हुए सात पदार्थ इस प्रकार हैं—जीव, अजीव, आस्रव,
संवर, निर्जन, बन्ध और मोक्ष।
२-पाँच अस्तिकाय इस प्रकार हैं—जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय,
अधर्मास्तिकाय तथा आकाशास्तिकाय।