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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

– ८१ –
उपमा में भी श्रोती उपमा का उदाहरण कवि ने राजा बीसलदेव के माण्डव
पहुँचने पर 'गोकुल माहि गोविंद' से दिया है :—
राजा जी पहूंच्या नगर मण्डारि ।
गल माहे हरषीय राजकुमारि ।
जाइ समी करइ आरसी ।
कलश संपूर्ण पूनिम चन्द ।
सुर १ नर मोह्या सुग्ग का ।
गोकुल माहि जिउठ प्रविश्य गोवंद ॥ २५ ॥
श्रोत्री उपमा की तरह 'आर्थी उपमा' का प्रयोग भी हमें निम्न पंक्तियों में
देखने को उस समय मिलता है जब राजमती बीसलदेव को विदेश-गमन से
रोकने के लिए यह कहती है कि विवाह के पश्चात् उसकी अवस्था ठीक बिकने
वाले घोड़े के समान हुई है जिस पर व्यापारी सौ सौ दिनों तक हाथ नहीं
फेरता ।
भाटिन कहइ सुणि राजा का पूत ।
अलख नाण कउ परउ कु सूत ।
पेटि व्याही राजा भोज की ।
सोनउ सोलहउ फाहि करइ छार ।
मरणजीवण राजा पग तलइ ।
कनक क्चोलउ डर धरइ भार ।
हेडाऊँ का तुरीय जिऊँ ।
हथ न फेरइ सह सट वार ॥ ८२ ॥
विरह वर्णन में कवि णल्ह ने उद्भावनक शैली का अवलम्बन किया है। इस
शैली में अधिकतर ऐसा देखा जाता है कि ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप
तो सत्य रहता है लेकिन उसके हेतु की कल्पना कल्पित होती है। इस प्रकार के
विधान में उत्प्रेक्षा का सहारा आवश्यक होता है। यह अलंकार स्वरूपों की व्यंजना
के लिये बड़ा शक्तिशाली होता है। प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना के
द्वारा कवि जिस क्रिया को हमारे सम्मुख उपस्थित करता है वह स्वाभाविक लगने
लगती है और हम इस बात की छानबीन नहीं करते कि हेतु ठीक है या गल्त ।
आसाढ़ माह में जल से परिपूर्ण मेघों को आकाश में घुमड़ते देख कर राजमती
को ऐसा प्रतीत होता है कि मदगलित हाथी की भाँति प्रमत्त मेघ आकाश में चल
रहे हैं। देखिये वह कहती है कि—

  • ८५ -

आसाढइ धुरि बाहुड्या मेह ।
पहिल्हया पाझ नइ वहि गई पोह ।
जइरि आसाढु न आवहो ।
माता रे महगल जेठ पग बेई ।
खद मत घाला जं दुजई ।
तिह घर ऊलग काइ करेइ ॥ १२८ ॥
प्रस्तुत की अप्रस्तुत रूप में सम्भावना कर कवि ने 'वस्तूत्प्रेक्षा' का सुन्दर
उदाहरण उपर्युक्त पद्म में दिया है ।
'उत्प्रेक्षा' के समान अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग भी कवि ने इस
रासो में कहीं-कहीं किया है । राजा बीसलदेव की बारात की विशालता का वर्णन
करते हुए कवि कहता है :-
राजा चालो परिणवा ।
नवइ चेदाउँधर छड़िउ सूरि ॥ २० ॥
राजमती की चमत्कारपूर्ण उक्ति भी पण्डित को बीसलदेव के पास भेजते
समय अतिशयोक्ति अलंकार का सृजन करती है । राजमती की यह उक्ति कि
बीसलदेव के वियोग में उसके बायें हाथ की मुद्रिका ढलक कर उसकी दाहिनी
बांह में आने लगी है लोक सीमा का उल्लंघन कर जाती है । देखिये उसके
अलंकार का चमत्कार :-
गोरडी बइठी छह थभणक जाइ ।
करि जोडी थारइ लागू पाइ ।
राजमती करइ बीनती ।
पंथ्या कहिज्यो धण का नाह नइ जाइ ।
आंगुली थाकी मुदडी ।
ढलिकन आगइहो धण कीयमाइ ॥ १४२ ॥
सादृश्यमूलक अलंकारों में 'रूपक' का अपना विशेष स्थान होता है ।
इस अलंकार की झलक इस रासोकार ने कहीं-कहीं दिखायी है । इसके प्रयोग में
यद्यपि कवि को पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त हुई है फिर भी रूपक बाँधने की उसकी
दक्षता अवश्य श्लाघ्य है । ऐसा एक स्थान देखिये :-
रहासू कहइ बहु परिमाहे बाइ ।
धंवरइ भोळइ गिलेसी राह ।

  • ८१ -
    चंदु पुनिह्मां यन गयउ ।
    दुहू विगड मग्गू मंजारि कह फिरि ।
    अलगाणा की गोरटी ।
    थारउ नाह घटीसइ धाणु अजमेरि ॥ १४१ ॥
    [ अर्थात्—राजमती का मुख पूर्ण चन्द्रमा है । उसके मुख रूपी चन्द्रमा को
    राहु रूपी सौन्दर्य छोड़न रूपवान् कहीं प्राप्त न कर लें अथवा उसके यौवन रूपी
    दुग्ध को माजार रूपी कामी पुरुष कहीं भक्ष्य न कर जायें क्योंकि उसका पति
    परदेश में है और उसका उभड़ा यौवन छिपाये नहीं छिपता । इसलिए राजमती
    की सास कहती है कि बहू घर में आओ । ]
    छन्द
    भारतीय छंदों के गणित पक्ष तथा सूत्र लक्षण का विधान संसार के छंद
    शास्त्रों में अद्वितीय है, इसे स्वीकार करने में किसी को संकोच न होगा । ब्राह्मण
    ग्रन्थों के रचना-काल से ही छंदों का प्रारम्भ भारतीय साहित्य में हो जाता है,
    यद्यपि उन ग्रन्थों में छंदों की दार्शनिक धारणायें ही केवल प्राप्त हैं परन्तु उन्हें
    उनका सैद्धान्तिक विवेचन नहीं कहा जा सकता । ब्राह्मण युग के पश्चात् वैदिक
    युग के प्रारम्भ काल से लेकर अपभ्रंश काल तक छन्दों का क्रमशः विकास हुआ
    है । विद्वानों के मतानुसार वैदिक छंदों में वर्ण विचार की प्रधानता पायी जाती
    है लेकिन डा० पुत्तूलाल शुक्ल के मतानुसार इनके पाठ में केवल अक्षर की
    गणना के अतिरिक्त स्वरों का भी प्रयोग किया जाता है, अन्यथा केवल अक्षर
    संख्या लय को जन्म देने में असफल हो जाती । वैदिक छंद पाठकारों और
    उनके छन्दों के लिपिकारों ने उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का प्रयोग तो किया,
    परन्तु वैदिक युग के छन्द-शास्त्रियों और परवर्ती युग के आचार्यों ने वैदिक छंदों
    पर विचार करते हुए मात्रा मैत्री का विवेचन नहीं किया और फलतः पृथक्-
    विषयक कोई सिद्धान्त भी निश्चित नहीं किया गया । चूँकि अक्षर और मात्रा
    भाषा के आदि काल से इतने अभिन्न और एकाकार हैं कि उनमें भेद करना
    कठिन है, सम्भवतः इसी कारण वैदिक छन्दों के सम्बन्ध में यह निश्चित सिद्धान्त
    नहीं बन सका कि वे केवल वर्णिक हैं या केवल मात्रिक । ऐसी विषम परिस्थिति
    में छन्द शास्त्रियों ने शायद इस नियम का, कि छन्द की पाठ पद्धति में जिस वर्ण
    के नियम प्रधान हों उसमें ही उन छन्दों की गणना होनी चाहिए, पालन किया
    है । वैदिक छन्दों को वर्णिक बताने में ही उपर्युक्त कहे गये नियम का अनुसरण

किया गया है क्योंकि वैदिक छन्दों में वर्णवृत्त की प्रधानता यहाँ तक विशेष थी
कि १०४ अक्षरों तक के छन्द निर्मित होते थे । वर्ण और मात्रा की खिचड़ी
संस्कृत काल के छन्दों में भी पकती रही ! छन्दों में वर्णिक और मात्रिक
का भेद तब स्पष्ट रूप से स्थापित हुआ जब वैदिक छन्द, वर्ग विशेष का साहित्य
बन गया और जनता से उसका सम्पर्क छूट गया । जनता ने यद्यपि अपना
सम्बन्ध-विच्छेद वैदिक और संस्कृत छन्दों से कर लिया फिर भी उनमें छान्द-
सिक संस्कार वैदिक और सांस्कृतिक ही थे । अतः जिस लय में वर्ण पर स्वराघात
देकर या उदात्त उच्चारण से छन्द पूरा किया जाता था जनता ने उस स्थान पर
एक मात्रा का योग करके उस लय को पूरा किया । लय को पूर्ण करने के लिये
मात्राओं के योग की यह जनपदीय पद्धति ही धीरे धीरे अपने अलग स्वरूप में
विकसित होने लगी । प्राकृतकाल के आगमन तक यह इतनी लोकप्रिय हो गई
कि इस काल के छन्द प्रारम्भ काल से ही मात्रावृत्त होने लगे । मात्रावृत्त छन्दों
के विकसित होने तथा जनता द्वारा अपनाये जाने के प्रधानतः दो कारण थे ।
प्रथमतः जन गीतों के चरण बहुत छोटे होते हैं जिनमें मात्रावृत्त छन्दों का ही
सफल प्रयोग सम्भव होता है । द्वितीयतः मात्रावृत्त छन्दों में कवि को स्वच्छन्दता
का अवसर रहता है जो वर्णवृत्त छन्दों में अपेक्षाकृत कम प्राप्त होता है । मात्रा-
वृत्त छन्द जनता के आदर के पात्र इसलिए भी बन गये कि इसमें संगीत के
उपयुक्त गुण भी वर्तमान थे । गीत में ताल का निशान प्रधान होता है जो कि
मात्राओं पर निर्भर होता है, वर्णों पर नहीं ।
मात्रिक छन्द अपनी उपर्युक्त विशेषताओं और सुविधाओं के कारण इतना
विशेष लोकप्रिय बन गया कि प्राकृतों के साहित्यिक रूप धारण करने पर जहाँ
मध्यकाल की प्राकृत रचनायें संगीत विहीन हो गयीं वहीं अपभ्रंश में जनता द्वारा
अपनाये जाने वाले मात्रिक छन्द इतने प्रचलित हुए कि इन छन्दों में आद्यो-
पान्त महाकाव्यों की रचना होने लगी । चौरासी सिद्धों और जैनाचार्यों की
कृतियों का सृजन, जो प्रायः नवीं शताब्दी के बाद हुआ, मात्रिक छन्दों में ही
हुआ । इन छन्दों का प्रचार उत्तरोत्तर इतना अधिक हुआ कि संस्कृत के कवि
गोवर्द्धनाचार्य तथा जयदेव ने भी अपनी कृतियों की रचना वर्ण-वृत्तों में न कर
मात्रिक छन्दों में की । मात्रिक छन्दों में भी 'पद्धटिका' छन्द का प्रयोग
बहुशः अपभ्रंश काव्य में पाया जाता है । इस छन्द में ८ मात्राओं के बाद
स्वभावतः ही ताल लगने के कारण संगीत के लिये यह विशेष रूप से उपयोगी
होता है । सङ्गीतोपयोगी छन्द पद्धटिका के समान ही नृत्योपयोगी 'घत्ता' और

जिस प्रकार हीरे का सौन्दर्य सफल खराद करने वाले के हाथों में जाकर
प्रस्फुटित होता है उसी प्रकार काव्य भी छन्दों के प्रयोग से निखर उठता है ।
यद्यपि कवि छन्दों का मुखापेक्षी नहीं होता और न वह यति गति के नियमों से
ही बँधा होता है फिर भी भावों की मधुरिमा के लिये लय की आवश्यकता होती
है जो वर्णों और मात्राओं की योजना पर निर्भर करती है । अतः छन्दों के मुखा-
पेक्षी न रहने पर भी अदृश्य रूप से ये ही व्यञ्जना सिद्धि में प्रेरक हैं इसे स्वीकार
करना ही पड़ेगा । छन्दों का चुनाव वर्ण्य विषय और भाषा को दृष्टिगत रख कर
ही होना चाहिए । आज तक के प्रकाशित ग्रन्थों को देखने से ऐसा प्रतीत होता
है कि न तो प्रत्येक छन्द हर प्रकार के वर्णन के लिये उपयुक्त होता है और
न प्रत्येक भाषा में ही प्रत्येक छन्द का सफल प्रयोग हो पाता है । 'अवधी' में
जितनी सफलता दोहा और चौपाई को मिली उतनी सफलता ब्रजभाषा में इन्हें
नहीं प्राप्त हुई । ब्रजभाषा के सफल छन्द तो कवित्त और सवैया ही थे । इसी
प्रकार नीति और उपदेशात्मक विषयों की व्यञ्जना में दोहा छन्द जितना सफल
रहा उतना अन्य छन्द नहीं । यह ठीक है कि छन्द शास्त्रियों ने ऐसा कोई विधान
नहीं बनाया कि अमुक विषय अथवा अमुक भाषा के लिये अमुक छन्द का ही
प्रयोग होना चाहिये फिर भी प्रकाशित रचनाओं की सफलता और विफलता को
दृष्टिगत रखते हुए उपर्युक्त निष्कर्ष निकाला जा सकता है ।
बीसलदेव रासो के छन्दों का निर्णय करते समय हमें उपर्युक्त सभी बातों
को ध्यान में रखना आवश्यक है । इस रासो का विषय शृङ्गार रस सिक्त है और
इसकी भाषा डिंगल है, यद्यपि भाषा की अस्तव्यस्तता और डिंगल व्याकरण
के नियमों की अवहेलना को देखते हुए ऐसा कहना निर्मूल न होगा । हाँ, इसकी
भाषा को नागर अपभ्रंश और साहित्यिक डिंगल का मिश्रण कहने में सम्भवतः
कोई अत्युक्ति नहीं होगी । अस्तु, ऐसी भाषा और इस ग्रन्थ के वर्ण्य विषय के
लिये कौन-सा छन्द उपयुक्त हो सकता था यह विचारणीय है ।
यों तो दसवीं से लेकर बारहवीं शताब्दी तक के राजस्थानी काव्य में सबसे
अधिक प्रयोग दोहा और छप्पय छन्दों का हुआ है जिसका कारण इसके काव्य में
वीर रस की प्रधानता है फिर भी इनके अतिरिक्त मन्दाक्रान्ता, शुभादाम, सु० ग०
प्रभात, पद्धरी, तोमर और गीत छन्दों का प्रयोग भी बहुत हुआ है—गीत छन्द
डिंगल साहित्य में अपनी विशेषता रखता है । डिंगल रीति-ग्रन्थों में इसके ८५
प्रकारों के लक्षण उदाहरण सहित मिलते हैं ।¹
१. रघुवर जसप्रकाश ।

२. द्वितीय खण्ड: बीसलदेव का उड़ीसा प्रवास, राजमती विरह व सन्देश

बीसलदेव रासो के छन्द इसकी अस्तव्यस्त भाषा और गणना-शून्य मात्राओं
से जड़ित रहने के कारण एक समस्या अवश्य उपस्थित करते हैं लेकिन सुविधा
यह भी है कि आरम्भ से इति तक प्रायः एक ही प्रकार के छन्द का प्रयोग हुआ
है। इसके कतिपय छन्दों की मात्राओं की गणना करने पर इस निर्णय पर पहुँ-
चना पड़ता है कि छन्दों के चरणों की संख्या छप्पय छन्द के अनुसार प्रायः छः
चरणों की होते हुए भी मात्राएँ प्रत्येक छन्द की भिन्न-भिन्न हैं और छप्पय छन्द
के लिये आवश्यक नियम का—प्रथम चार चरणों की, रोला के (२४, २४ मात्रायें
११, १३ की यति से) तथा अन्तिम दो चरणों का उल्लाला के (२८, २८ मात्रायें,
१५, १३ की यति से या २६, २६ मात्रायें १२, १४ की यति से) --पालन नहीं
हुआ है। ये छंद, छंद-शास्त्र के नियमानुसार विषम कोटि के हैं—क्योंकि इनके
प्रत्येक चरण की मात्रा असमान है और ये साधारण जाति के हैं क्योंकि
प्रत्येक चरण की मात्रा ३२ से अधिक नहीं है । इस विचित्रता को देखते हुए
ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रन्थ का रचयिता छन्द-शास्त्र का पण्डित नहीं था । इसी-
लिए बीसलदेव रासो की रचना छंद-शास्त्र की कसौटी पर खरी नहीं उतरती ।
यह कहने में अत्युक्ति न होगी कि 'संगीत' शब्द का प्रयोग यहाँ शास्त्रीय संगीत
के लिये नहीं वरन् उस 'संगीत' के लिये किया गया है। जो मानव जीवन के अन्त-
: दर्शन और साथ ही उसकी रागात्मक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति में सहायता
पहुँचाता है। पशु पक्षी तक में अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति की क्षमता है ।
आनन्द या दुःख के कारण जिस प्रकार मानव में आत्मप्रसार का भाव जागृत
होता है उसी प्रकार पशु-पक्षियों में भी । वैज्ञानिकों ने तो यहाँ तक सिद्ध कर
दिया है कि उद्भिद् जगत् में भी राग-द्वेषात्मक अनुभूति वर्त्तमान है । लेकिन
जहाँ मानव ने वाणी द्वारा अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व देने
की चेष्टा की है वहाँ पशु-पक्षी और उद्भिद् जगत् विवश हैं । पशु-पक्षी या
उद्भिद् जगत् अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को स्थायित्व मानव की तरह भले
ही न दे सकें पर इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि सरिता का कलकल
निनाद, अमराई में बठे हुये पपीहे की 'पी कहाँ' 'पी कहाँ' की पुकार, नीड़ में
सायंकाल लौटते हुए पक्षियों का कलरव, उषा के आगमन के साथ ही कलियों
का विकसना स्थायी है और साथ ही है संगीतात्मक अर्थात् मधुर लययुक्त एव
भावात्मक ।
मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों को वाणी द्वारा संगीतात्मक रूप में अभिव्यक्त
करने की चेष्टा कब से की यह कहना तो कठिन है लेकिन प्राचीन जातियों के

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:

— ४१ —
इतिहास में—जिसका अधूरा ज्ञान ही आज उपलब्ध है—इसका संकेत अवश्य
मिलता है कि शब्दों का उस काल तक कोई विशेष महत्त्व नहीं था तथा विषय-
विधान का विकास भी नहीं हो सका था । भाषा ऐसी अवस्था में थी जिसमें
भावप्रकाशन की क्षमता न्यून थी और भावप्रकाशन के विस्तार के लिये भाषा
के साथ वाद्य यन्त्रों की सहायता अपेक्षित थी । वाद्य यन्त्र भी अपने पूर्ण विक-
सित रूप में न थे वरन् साधारण वाद्य यन्त्र ही काम में आते थे । इस काल के
प्राप्त काव्य यह भी सिद्ध करते हैं कि इस काल तक सामूहिक और वैयक्तिक
भावना में अधिक अन्तर न आ सका था । अस्तु, इसके द्वारा कुछ अंशों में यह
निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काव्य में प्रकट किये गये मनुष्यों की भाव-
नाओं से अधिक प्रभावित उनके संगीतात्मक रूप से होता रहा होगा क्योंकि
समाज की अविकसित अवस्था में मनुष्य के लिये काव्य में प्रकट की हुई भावनाओं
को समझना सहज सम्भव नहीं । स्वर सम संगीत की उत्पत्ति जिसका—उल्लेख
ऊपर किया गया है—वहीं से मानी जा सकती है । काव्य के इसी संगीतात्मक
स्वरूप का विकास होता रहा और क्रमशः इसकी दो शाखायें हो गयीं । एक शाखा
का विकास संगीत के शास्त्रीय विधान के रूप में हुआ और दूसरी का काव्य के
रूप में । काव्य में संगीतात्मकता और चित्रात्मकता दोनों का सामञ्जस्य और
सन्तुलन ही चूँकि उसमें जीवन डाल देता है, इसलिये कवि की सफलता भी
दोनों के सामञ्जस्य और समन्वय उपस्थित करने में ही है। ऐसे काव्य का जो
अपने प्रारम्भिक काल में अवश्य लोक गीतों के रूप में रहे होंगे, नमूना अब प्राप्त
नहीं है । आज तो लोकगीतों का वही नमूना मिलता है जहाँ संगीत (शास्त्रीय
संगीत) और गीत का अन्तर स्पष्ट होने लगता है । संगीत में जहाँ शास्त्रीय
विधान की रक्षा का आग्रह होता है वहाँ लोकगीतों में भावुकता और आत्मा-
भिव्यञ्जना का । विद्वानों के मतानुसार लोकगीत और संगीत के तीन प्रधान
अन्तर हैं ।
संगीत | लोक गीत
(१) संगीत में शब्दों का महत्त्व नगण्य है | (१) लोक गीतों में शब्द केवल स्वर के
वे केवल स्वर के विस्तार और संकोच | विस्तार और संकोच के लिये
के लिये आते हैं । स्वर प्रवाह ही | नहीं आते वरन् अर्थ की परिधि
उनका प्रधान लक्ष्य है । अर्थ की | को विस्तृत भी करते हैं ।
परिधि को केवल स्पर्श मात्र करते हैं ।

  • ३२ -
    (१) संगीत के लिये वाद्य यन्त्रों की (२) गीतों के लिये वाद्य यन्त्र अनि-
    अपेक्षा है। वार्य नहीं।
    (२) संगीत शास्त्रीय विधान के बन्धन से (१) गीत शास्त्रीय विधान के विरोध
    बद्ध है। में आत्मनिष्ठा का आधार लेकर
    पनपते हैं।
    लोक गीत जिस अवस्था में प्राप्त हैं उसमें छन्द और अर्थ दोनों की प्रधा-
    नता है और आग्रह है संगीतात्मक एवं रागात्मक अनुभूति का, शास्त्रीय संगीत का
    नहीं। एक विशेषता इन लोक गीतों की यह भी है कि इनका विरोध न केवल
    शास्त्रीय संगीत से वरन् काव्य के स्वीकृत मानों की कृत्रिमता के प्रति भी है।
    जो आत्मीयता, आत्मनिष्ठता और संवेदनशीलता उनमें है वह शास्त्रीय काव्य-
    विधान में नहीं।
    कुछ पश्चिमी विद्वानों ने भी गीत के उपर्युक्त मानों को स्वीकार करते हुए
    कहा है :-
    "गीत काव्य का कवि, जगत् के सारे तत्वों को अपने में समाहित करता
    है, अपने वैयक्तिक भावों के प्रभाव से इसे पूर्णतः आत्मसात् करता है और
    इस आत्मपरकता को सुरक्षित रखने वाली शैली में अभिव्यक्ति करता है।"
    ( टिशोछ—मेथड ऐण्ड मैटीरियल्स ऑव् लिटरेरी क्रिटिसिज्म पृ० ५)
    [ इसी प्रकार 'पालग्रेव' कहते हैं कि-
    गीत काव्य इकहरे विचार, अनुभूति या स्थिति का चित्रण है,
    जिसमें संक्षिप्तता मानवीय भावना का रंग और गति अवश्य
    होनी चाहिये।"
    ( पाल्ग्रेव्स गोल्डेन ट्रेजरी ऑव् सांग्स ऐण्ड लिरिक्स—प्रिफेस )
    हिन्दी साहित्य में लोक गीतों के जो उदाहरण प्राप्त हैं वे हिन्दी भाषा
    की विभिन्न 'बोलियों' में ही हैं। इसका प्रधान कारण सम्भवतः एक यही है कि
    'बोली' में जितनी सरसता और आत्मीयता पायी जाती है उतनी व्याकरण के
    नियमों से आबद्ध भाषा में नहीं। लोक गीतों के निम्न कतिपय उदाहरण सहज
    सिद्ध करेंगे कि काव्य के मानों और शास्त्रीय संगीतों के विधानों की अवहेलना
    करने पर भी ये गेय हैं और उनमें है सरसता और आत्माभिव्यक्ति। राजपूताने में
    स्त्रियाँ हवेलियों में गा रही हैं—
  • १३' -
    घाम चल्या छा भँवर जी ! पोपली जी,
    राँणी ढोला ! हो गयी घेर घुमेर ।
    बैठौँ की रुत चाल्या चाकरी जी,
    ओजी म्हौरा सास सपूती रा पूत ।
    मवना सिधारो पूरब को चाकरी जी ॥
    [ गुजरात की कोई कन्या ससुराल जा रही है और कहती है—
    अमे रे लील़ा वननी चरकलड़ी उड़ो जाशुँ परदेश जी ।
    आज रे दादाजीना देशमाँ काले जाशुँ परदेश जी ॥
    [ बिहार युक्तप्रान्त और मध्यप्रान्त में आइये, कहीं सुहाग की रात है और
    आनन्द में मग्न वधू गा रही है—
    आज सोहाग कै रात चन्दा तुम उइहौ ।
    चन्दा तुम उइहौ सुरुज मति चइहौ ॥
    मोर हिरदा बिरस जनि किहेउ सुरुग मति बोलेउ ।
    मोर छतिया बिहरि जनि जाइ तू पह जिनि फाटेउ ॥ '
    आजु करहु बड़ी राति चन्दा तुम उइहौ ।
    धीरे धीरे चलि भोग सुरुज बिलम करि अइहौ ॥
    [ अथवा 'मेघदूत' के संदेशवाहक मेघों की भांति विरहिणी का बादलों द्वारा
    पिया के पास संदेश भेजना कितना हृदयस्पर्शी है—
    कारिक पियरि बदरिया झिमिकि दैय बरसहु ।
    बद्रो जाइ बरसहु उही देस जहाँ पिया फोड़ करै ॥
    भीजै आरार बादर सम्भुआ कनकिया ।
    अरे भितराँ से हुलसै करेज समुझि घर आवै' ॥
    और इन्हीं लोक गीतों के सदृश बीसलदेव रासो के भी पद हैं । रानी
    राजमती उलग ( परदेश ) जाते हुए अपने पति से विनय करती है कि वह भी
    उनके साथ चलेगी । एकाकी रहना उसके लिये दुसहं है—
    हउ न पवीजुं राजा थाकी से बात ।
    साधान चालिस्यइ राइ कइ साथ ।
    बादली हुइ करि वापरउं !
    पाघत सार सिस्वाड डोलिस्या बाइ ॥
    उभी पहरइ जागिसिउ ।
    अण परि सेविश्यउ आपणउ राय ॥--( पद संख्या ६२-)
  • ९४ -

निसन्देह उपर्युक्त लोक गीतों के उपस्थित किये गये उदाहरण यह सिद्ध
करेंगे कि लोक गीतों में कल्पना की विशद उड़ान नहीं, संगीत का शास्त्रीय
विधान नहीं, न छंद के कृत्रिम मानों का आग्रह नहीं, है केवल साधारण शब्दों में
अन्तर्दशा की गहन स्वाभाविक और मार्मिक अभिव्यक्ति । लेकिन यदि कला
रागिक भावों की आवेगपूर्ण अभिव्यक्ति है तो ये लोक गीत निश्चय ही
कलात्मक हैं । उनमें भावना और संगीतात्मकता का समन्वय है । छंदों में चूंकि
वृत्तों की यतिबद्धता ही उनके आन्तरिक लय को स्थिरता प्रदान करती है
इसलिये छन्द शास्त्रियों ने प्रत्येक छन्द के लिये कितनी मात्राओं के पश्चात् यति
आवश्यक है इसका निर्देश कर दिया है । इसके विपरीत संगीत के हेतु रचे गये
पदों और लोकगीतों में यति-निर्धारण का नियम लागू नहीं होता वहाँ 'स्वरसम'
का नियम ही सामान्यतया स्वीकृत हुआ है । बीसलदेव रासो के रचयिता ने
भी 'स्वरसम' के नियम को ही सम्भवतः स्वीकार किया है, और यही कारण है।
कि यद्यपि बीसलदेव रासो के छन्दों में यतिबद्धता का अभाव है फिर भी वे
गेय हैं ।
काव्य के कृत्रिम मानों के अभाव और शास्त्रीय संगीत के विधानों की
अनियमितता के कारण ही शायद पं० मोतीलाल जी मेनारिया ने कहा है कि
"बीसलदेव रासो गीतकाव्य नहीं है । राजस्थान में यह कभी गाया नहीं गया,
न आज गाया जाता है और न इसमें गीतकाव्य के कोई लक्षण मिलते हैं ।
गीतकाव्य की भाषा में जो चञ्चलतापन, छन्दों में जो गति, शब्दों में जो मर्म-
स्पर्शिता और विषय में जो ऐकप्रियता होनी चाहिये वह इसमें नहीं है ।"१ लेकिन
वृत्त और संगीत का जो मूल भेद ऊपर बताया गया है उस० अनुसार तो रासो
की गेयता में संदेह प्रकट करना उचित नहीं । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा
'रघुनाथ रूपक गीतारो' में वर्णित गीतकाव्य के लक्षणों के बीसलदेव रासो के
पदों में प्राप्त न होने के कारण यदि इसकी गेयता में प्रश्न चिन्ह लगाया जाता
है तब यह कहना पड़ेगा कि 'गीतकाव्य' और 'गीत' का अन्तर समझने का
प्रयत्न नहीं किया गया है । 'रघुवर जसप्रकाश' अथवा 'रघुनाथ रूपक
गीतारौ' दोनों लक्षण ग्रन्थ हैं जिनमें 'गीत' छंद के लक्षणों का वर्णन है ।
बीसलदेव रासो 'लोक गीत' है इसलिए इसमें 'गीत' छंद के लक्षण नहीं
प्राप्त होते । अब रही बात इसकी भाषा में चञ्चलतापन, शब्दों में मर्मस्पर्शिता

१—राजस्थानी भाषा और साहित्य—पृ० ८७ ।

तथा विषय में लोकप्रियता के प्रभाव ही । इसके लिये तो यही कहना पर्याप्त
होगा कि इसकी प्राचीनतम प्रति जो प्राप्त मात्र है वह १६३३ की है। और
और इसका रचनाकाल यदि ११ वीं या १२ वीं शताब्दी का माना जाय जैसा कि
अनेक कारणों से मानना पड़ता है तब तो यह कहना ही पड़ेगा कि भाषा में
अलबेलापन, शब्दों में मनोहरिता और विषय में लोकप्रियता के कारण ही यह
चार सौ वर्षों पश्चात् लेखबद्ध हुआ ।
भाषा
यह ठीक है कि आज की प्राचीनतम हस्तलिखित प्रति हमें यह सोचने के
लिये बाध्य करती है कि यह ग्रन्थ कई शताब्दियों तक मौखिक रहा फिर भी
इसी प्राचीनतम प्रति की भाषा के अन्य रूपक में छिपी हुई प्राचीनता ११ वीं
शताब्दी की भाषा का परिचय देती है। यहाँ वि० सं० १६३३ वाली हस्त-
लिखित प्रति से प्राप्त भाषा का संक्षिप्त व्याकरण इसलिये उपस्थित किया
जा रहा है कि इसके द्वारा ग्रन्थ के रचना-काल की भाषा पर कुछ प्रकाश पड़
सके—
उच्चारण
[१] ग्रन्थ में तालव्य 'श' और मूर्द्धन्य 'ष' का प्रयोग नहीं हुआ है ।
'ष' का प्रयोग 'ख' के रूप में हुआ है—
पाष          खान
पाष          खाज
षेह          खेद
पाषड         खाडड 'खारा'
पडक्षि         पडक्ति ( खौरि )—इत्यादि ।
[२] वर्णमाला के अक्षर 'ऋ' और 'ऌ' का प्रयोग शब्दों के साथ नहीं
है। मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग शब्दों के अन्त तथा मध्य में दन्त्य 'न' के स्थान पर
बराबर हुआ है। दन्त्य 'न' से प्रारम्भ होने वाले शब्दो में मूर्द्धन्य 'ण' का प्रयोग
नहीं हुआ है—
पाहण          पाहन
भणइँ          भनई
गिणइँ          गिनई

  • ३५: -
    माणियो भानियो
    वयणु वयन
    मागिण मागिन
    मयण गयन
    गिण गिन, इत्यादि।
    [३] अपभ्रंश की भाँति संज्ञाओं के अन्त में 'ड़ा', 'ड़ी' और 'ड' का प्रयोग
    मिलता है।
    गूजड़ा सेसड़ी
    मुदड़ी गोहड़ी
    राएड़ी चूनड़ी
    दुप्पटी भापड़ी
    हठवट पतरंड इत्यादि।
    दोयट
    कारक
    बीसलदेव रासो की १६३३ वाली प्रति में विभक्तियों की दशा बड़ी विचित्र
    है। डिंगल में प्रयुक्त होने वाली विभक्तियाँ जो प्रायः व्यवहार में लायी गयी हैं
    उसका प्रधान कारण 'रासो' का १७ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा जाना ज्ञात
    होता है। डिंगल में कारक दो प्रकार से व्यक्त किये जाते हैं। एक प्रकार वह
    है जिसमें शब्दों के साथ विभक्तियों का प्रयोग होता है और दूसरा प्रकार यह
    है जिसमें शब्दों के साथ पार्सर्ग ( Post position ) का व्यवहार किया
    जाता है। रासो में इन दोनों प्रकारों का प्रयोग हुआ है। दोनों प्रकारों के प्रयोगों
    का उदाहरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है :-
    १. विभक्ति के साथ-
    प्रथमा-राइ, गोरि, गोरदि, पंडइ, जोयिनऊ।
    द्वितीया-मुंपिउठ, पतउठ, पीवउठ, सीसउठ, औपयठ, कंपउ।
    तृतीया-हस्ते, राइ, मुखि, हुपि, दिठि।
    चतुर्थी-अजमेरि।
    पञ्चमी- ÷
    षष्ठी-सुरगह, सुरह, वनह, जोवनह।
    सप्तमी-अजमेरि, उळगइ, तनहि, सिरि, घरि, दुवारि, देसि, मनि।
    अष्टमी (सम्बोधन)-पंडिया, बालमदेव, गोरी, रणी- इत्यादि।
  • ३७ -
    २. परसर्ग के साथ-
    कर्त्ता- +
    कर्म - माधवह, राणीमह, जोगीमह, राजमतीनह, गोरीनह ।
    करण-जाणिवरि, माथासा, पुरुषसिउ, स्वामी सिऊ, घरतीरथं ।
    सम्प्रदान- +
    अपादान-गउदते, फलाने ।
    सम्बन्ध-गवरका, उसगाणा की, भोजकह, सयाणायण्ड, 'बुद्धइव', जेसद्ध-
    जेसळमेररी', अजमेरा कयह ।
    अधिकरण-मनमाहे, राजमाहि, परटेमह पर, पगे मो ।
    सम्बोधन- हे हिरणीय, हे अभया, हे घण-इत्यादि ।
    सर्वनाम
    पुरुष वाचक
    प्रथम पुरुष द्वितीय पुरुष तृतीय पुरुष
    कर्त्ता म्है, म्हा तुम्हे, तू, ये, तउ उस, उव, सो
    कर्म म्हारू, हमि, म्दानह, तोहि, तोन, तूनह, उनवि, उणनह,
    म्हारह, म्हारूह, तूहेह, तउ, तुमही तिहा, तिणह
    मोनह, मोह सोइ
    करण म्हा, स, हमस्यं तुम्हस, तं विणि सं,
    तिणासां
    सम्प्रदान + + +
    अपादान + + +
    सम्बन्ध म्हारी, म्हाकह, मउ, थारइ, धारउ, थारी, तिणि, उयारह
    मो, म्हारइ, माका, थारा, तिस, तोरो,
    म्हारउ, म्हारीय, म्हा, थाकउ, तुझ, तोरीं
    म्हारी, मुधि, म्हाका,
    म्हारा, मोरा
    अधिकरण + + -इत्यादि ।
    अन्य सर्वनाम
    'कोई' (अनिश्चय वाचक) 'जे' (सम्बन्ध वाचक)
    'यह' (निश्चय वाचक) 'किसउ' (सर्वनामिक विशेषण)
    'जउ' (सम्बन्ध वाचक) 'सो' (सम्बन्ध वाचक)
  • ४८ -
    'जिरा' (सम्बन्ध वाचक) 'काहू' (प्रश्नवाचक
    'कह' (प्रश्नवाचक) 'सउ' (सार्वनामिक विशेषण),
    'किह' (प्रश्नवाचक) 'कियकड' (अनिश्चयवाचक),
    'कठ' (प्रश्नवाचक) 'ताहू' (अनिश्चयवाचक),
    'समी' सार्वनामिक विशेषण) 'वसौ' (निश्चयवाचक)
    'ए' (निश्चयवाचक) 'कवण' (प्रश्नवाचक),
    'ते' (सम्बन्धवाचक बहुवचन) 'एह' (निश्चयवाचक)
    'कुण' (प्रश्नवाचक)-इत्यादि ।
    अव्यय
    जिमि-जैसे । किम-कैसे । जाणि-मानों । कइ—या, अथवा जैसा-जैसा ।
    किसी-कैसी । तबइ-तब । इव-इस प्रकार तब—तब । सदि-साथ । किसो परि
    किस प्रकार । क-कैसे । सम—समान अरु—और :
    क्रिया
    वर्तमान काल
    कारक की भाँति क्रियाओं का रूप भी बीसलदेव रासो में प्राय डिंगल का
    वही है । हिन्दी में वर्तमानकालिक क्रिया के साथ जिस अर्थ में 'है' का प्रयोग
    होता है डिंगल में उसी अर्थ में प्रायः 'छह' प्रयुक्त होता है । रासो में है के अर्थ में
    'छह' का प्रयोग प्रायः बर्त्तमान काल की क्रिया के अन्य पुरुष में पाया जाता है ।
    अन्य पुरुष—बोलावइ छह, वाजइ छह, दीजइ छह, बहठी छह, वरसइ
    छह, मेलइ, मोडर छह—इत्यादि ।
    वर्तमान काल की क्रिया में है के अर्थ में 'छह' के तथा उकारान्त प्रयोग
    के अतिरिक्त अपभ्रंश के क्रिया पद 'इकारान्त' का भी प्रयोग अनेक स्थलों पर
    इस काव्य में किया गया है ।
    एक वचन बहु वचन
    अन्य पुरुष—छहजइ, भजइ, गिणइ, कहइ, गाइ, चितवइ, +
    जाइ उच्चरइ, पुच्छइ, नाणइ, बोलावइ, हसाइइ,
    वरिसइ, इत्यादि ।
    मध्यम पुरुष—धरउ, जाउ, जाणउ, सबहउ—इत्यादि +
    प्रथम पुरुष—वीनवउ, मणवउ, गरजूं, पडउ, छागू, अयउ, बहउ—
    इत्यादि । +
    भूतकाल
    भूतकालिक क्रियाओं में डिंगल में मूल क्रिया के पीछे 'इउ' 'यउ' 'इउ'
  • ९९ -
    तथा कहीं-कहीं 'इयउ' और 'उउ' लगा कर सामान्य भूतकाल के रूप बनाये जाते
    हैं—रासो में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हैं—
    \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन
    अन्य पुरुष—चालियउ, रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोयउ,
    \phantom{अन्य पुरुष—}हरव्यउ, बोलियउ, भागिणीयउ, दीठउ,
    \phantom{अन्य पुरुष—}मेल्लउ, पहिल्लउ—इत्यादि \phantom{कियउ, खोयउ,}+
    मध्यम पुर ष—कहउ, सुणउ, इत्यादि । \phantom{कियउ, खोयउ,}+
    प्रथम पुरुष—छोड़उ, तिजउ, डुबउ, साझोयउ, चूकउ, परिहरयउ,
    \phantom{प्रथम पुरुष—}इत्यादि । \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय}+
    रासो में भूतकाल की क्रियाओं के उपर्युक्त रूपों के अतिरिक्त भी जो अन्य
    रूप प्राप्त हैं उनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है—
    \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन
    अन्य पु०-मिल्ली, दीन, पोन्दा, आया (खड़ी बोली) दिया (खड़ी
    \phantom{अन्य पु०-}बोली) हुई स्त्री० खड़ीबोली), दिन्ही (स्त्री), रहा (खड़ी
    \phantom{अन्य पु०-}बोली), गयो, आवीया, छाड्या, कीन, गई (स्त्री० खड़ी
    \phantom{अन्य पु०-}बोली), गया (पु० खड़ीबोली,)—इत्यादि । \phantom{खो}+
    मध्यम पु०—देख्यो, सवाहा (खड़ी बोली) साइया, सिरजी, दिन्ही
    \phantom{मध्यम पु०—}थी, पहुता—इत्यादि । \phantom{आयियउ, रच्यउ, कि}+
    प्रथम पु०—विसारा, करती (स्त्री० खड़ी बोली), बोलइ थी (स्त्री०खड़ी
    \phantom{प्रथम पु०—}बोली) छडी (स्त्री०) बोलिय्यो, थाकीय, कही (स्त्री० खड़ी
    \phantom{प्रथम पु०—}बोली), पिछाणीया आदि ।
    भविष्यत् काल
    भविष्यत् काल के रूप डिंगल में दो तरह से बनाये जाते हैं १—मूल क्रिया
    के अन्त में 'सी', 'स्यू' तथा 'स्या' लगा कर और २—'ला', 'लो' तथा 'लौ'
    लगा कर। बीसलदेव रासो में द्वितीय प्रकार से बने भविष्यत् काल की क्रियाओं
    के रूप का अभाव है ।
    \phantom{अन्य पु} एक वचन \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कियउ, खोय} बहु वचन
    अन्य पु०—भाषिसी, मरेसी—इत्यादि । \phantom{रच्यउ, कि}+
    मध्यम पु०— \phantom{चालिस} + \phantom{रहिउ, आयियउ, रच्यउ, कि}+
    प्रथम पु०—चालिस्यो, आणिस्यां, मिलैस्यो, बोलिस्यां, पधारिस्यो,
    \phantom{प्रथम पु०—}करैस्यां, आविस्यां, पूछिस्यां, इत्यादि । \phantom{कि}+
    'सो' 'स्यू' तथा स्या' लगा कर बने हुए भविष्यत् काल की क्रियाओं के
  • १०० -

रूप के अतिरिक्त जो अन्य रूप 'बीसलदेव' रासो में प्राप्त हैं ये नीचे दिये जा
रहे हैं-
एक बचन बहु बचन
अन्य पुरुष-जाणिस्यह, चखवाणगाउठ, मिलैसीय, धाविया, विसामइ,
मिलैसह (स्त्री०)। +
मध्यम पुरुष- + +
प्रथम पुरुष--फरेण, भाणिसिउ (स्त्री०) सेविस्यउ (स्त्री०) मिलठ,
पहुचिस्यौ इत्यादि। |-
पूर्वकालिक क्रिया-
डिंगल में क्रिया के अन्त में 'एवि' 'एविय' 'इ' 'ई', 'अ' 'य' 'नइ'
'करि' आदि प्रत्यय लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप बनाये जाते हैं।
रासो में उपर्युक्त प्रत्ययों में से कई एक को लगा कर पूर्वकालिक क्रिया के रूप तो
बनाये गये ही हैं लेकिन इन प्रत्ययों के योग से बने हुए पूर्वकालिक क्रियाओं के
रूपों के अतिरिक्त भी कतिपय अन्य रूप इसमें प्राप्य हैं। नीचे दोनों प्रकार के
रूपों का उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है-
( अ ) डिंगल के प्रत्ययों के योग से बनी हुई क्रियाएँ-
सुणइ, कहइ, जाइकरि इत्यादि।
( ब ) डिंगल के प्रत्ययों के अतिरिक्त पूर्वकालिक क्रियाएँ-
सहणजाइ, कहिज्योनाइ, देयणडजाइ, मेलडीजाइ-इत्यादि।
आज्ञा विधि-
रासो में आज्ञा और विधि के रूप निम्न प्रकार के पाये जाते हैं-
एक वचन बहु वचन
अन्य पुरुष-कीजइ, सुखउ, देइ, गमरकरउ, फाड, इत्यादि। +
मध्यम पुरुष-आणिज्यो, देज्यो, जोइज्यो, करिज्यो, वितावावज्यो,
मानिज्यो, सुणिज्यो, निरवाडिज्यो, चालिज्यो, सुण,
सुखउ, कहि, धावउ-इत्यादि। +
प्रथम पुरुष- + +

गवरूा¹ नंदन त्रिभुवन सार ।
नाद भेदइ² थारइ उदर भंडार ॥
एक दंतउ मुषि³ झलहलइ⁴ ।
मुषिकउ⁵ वाहण तिलरु सेंदूरि⁶ ॥
करि जोड़ि⁷ नरपति⁸ भणइ ।
आषि करि⁹ रोहणी निसि¹⁰ तपउ¹¹ सूरि¹² ॥ १ ॥
भवण नइ देपउरे रवि तपई¹³ ।
१. आ० २ गौरी । आ० ६, ६ गवरिवा । आ० १२ गउरि ।
२. आ० २ आ० ६, वैदा ।
३. आ० २ आ० ६, मुख । आ० १२ मुपे ।
४. आ० ६ झलमलइ (झलमलि = झलमलइ) ।
५. आ० २ मूषा आ० ६ मूषाक ।
६ आ० २ सेंदुर, आ० १२ सिंदूर ।
७. आ० २ जोड़ै ।
८. आ० ६ नाहलो (= नाल्हो) ।
९. आ० २ जाणिक, आ० ६ जाणकि ।
१०. आ० २ रोहिणीउड, आ० ६ रोहिणीउड, आ० ६ रोहिणीयु,
आ० १२ रोहिणीजिउ ।
११. आ० ६ तपे आ० १२ तपइ ।
१२. आ० १२ सूर ।
१३. आ० १२ तलइ ।
यह छंद आ० ६ में १, प्र० २ में २, आ० ६ में १, आ० १२
में १ है ।
इस छंद की अंतिम पंक्ति हस्त लिखित प्रति की छंद नं० २ की प्रथम
पंक्ति है । लेकिन यह भूल से लिखी हुई ज्ञात होती है । क्योंकि यह पंक्ति
ध्रुवक के रूप में है जो प्रत्येक छंद के अंत में आता है ।

  • २ -
    हंस गमणि¹ मृगालोचनी² नारि ।
    सीम मगग्ह दिन गिणइ³ ॥
    सतपिण⁴ उलीछइ राजदुवारि ।
    चिहु दिसि नाह निहालती ॥
    का⁵ सिरजी⁶ उलगणा⁷ की नारि ।
    जाइ दिहाडउ झूरता⁸ ॥ २ ॥
    दूसरौ⁹ कडवड¹⁰ गणपति गाइ ।
    नवणि नवकरि¹¹ लागे जी पाइ¹² ॥
    तोदि लंबोदर रीनगउ¹³ ।
    सिद्धि बुधि का स्वामी मुगति दातार¹⁴ ॥
    १. अ० २ हंस गाहणि, आ० १२ गज गमणी ।
    २ अ० २ मिगलोचनि, आ० ६ मृगलोचणी ।
    ३. आ० ६ गणै ।
    ४. आ० ६ सायघण, आ० १२ ततपिण ।
    ५. अ० २, आ० ६ जिण, आ० १२ काइ ।
    ६ अ० २ सिरजइ, आ० ६ सिरजा ।
    ७. आ० ६ उलिगणधर ।
    ८. आ० ६ भूरती, आ० १२ रे झूरता ।
    यह छंद अ० २ में १, आ० ६ में २, आ० ६ में २, आ० १२ में
    ३ है । अ० २ में एक और अतिरिक्त पाठ है—"इसी नारी न देव
    दुग्गिणीकाइ" आ० १२ में चौथी पंक्ति है—"नाहनइ जोवइरे
    चिहुँदिसइ ।"
    ९ आ० १२ दुसरइ ।
    १० आ० ६ कडवेजी, आ० १२ कडुवइजी ।
    ११. आ० ६ नमीकरी, आ० १२ नवण कहूँ ।
    १२. अ० २ बीनम्, आ० ६ बीनउ, आ० १२ बीनवु ।
    १३ अ० २ भूलेउ, आ० १२ भूलोजी ।
    १४. आ० १२ अवलागुजी पाइ ।
  • ३ -
    चउथि फउं थारउ पारखउ ।
    तंजी भूलडजी¹ अक्षर आणिस्यो ठाइ ॥ ३ ॥
    हंस बाहण देवी करधरउ² वीण ।
    जूठउ³ किरत कहई⁴ कुल हीण⁵ ॥
    वर देइओ⁶ मातासारदा⁷ ।
    भूलउ⁸ अक्षर आणिस्यो ठाइ ॥
    तह⁹ तूठी¹⁰ अक्षर¹¹ जरइ¹² ।
    नाह्र भवइ अति सरसीय वाणि¹³ ॥ ४ ॥
    १. आ० १२ सिद्धि नई तुद्धि तणउ भंडार ।
    यह छंद आ० ६ में ३, अ० २ मे ४, आ० ६ में ३, आ० १२ में
    २ है । लेकिन अ० २ में १, २, ४ तथा ५ पंक्तियां निम्न प्रकार से हैं :-
    १. तुठी सारदा त्रिभुवन-माई ।
    २. देव विनायक लागू हू पाय ।
    ४. चउसठि जोगिनि का अगिवाण ।
    ५. चडय जोहारू रोपरौ ।
    २. आ० ६ ग्रहइ, आ० १२ करिधरी ।
    ३. अ० २ कुकठबंधू बोलू, आ० १२ झूठउ जो कवित ।
    ४. आ० ६ कहूँ ।
    ५. आ० ६ मतिहीण ।
    ६. आ० ६ दीयो ।
    ७. आ० ६ देवी सारदा, आ० १२ सारदा ।
    ८. आ० १२ भूलोजी ।
    ९. अ० २ तो ।
    १०. अ० २ तूठा, आ० १२ तूठइ ।
    ११. अ० २ वर ।
    १२. अ० प्रापियइ, आ० १२ जुटइ ।
    १३. आ० १२ वाण ।
    यह छंद आ०६ में ४, अ०२ में ५, आ०६ में ४, आ०१२ में ४ है ।
  • ४ -
    भारह रमायण रम भरी गाइ ।
    नृती छइ¹ मारदा त्रिभुवन माय ॥
    उलगाणा गुण² वनवड³ ।
    मुगुण⁴ सामाणमा⁵ संपेविना⁶ रानि ॥
    स्त्रीयचरित्र⁷ घण⁸ पणू⁹ लहह ।
    एक्की अक्खर¹⁰ वञ्न¹¹ विसाम ॥ ५ ॥
    किंतु आ० २ में २, ३, ५ और ६ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं
    २. सुकट फथू षोलू कुलदेण ।
    ३. तो तूंठा वर प्रापिणइ ।
    ५. वीसलदे रास प्रगासता ।
    ६. नाल्ह कहइ जिणि आनइ हा गाडि ।
    इसी प्रकार आ० ६ में निम्न दो पंक्तियां अतिरिक्त हैं:—
    सरसता सामणि करी वै पसाय ।
    रास कहूँ राजा वीसलराय ॥
    १. आ० १२ नूतह जूठी छै ।
    २. आ० ६ रग ।
    ३. आ० ६ वराखण्ड, आ० २ वरखता, आ० १२ वरखण्ड ।
    ४ आ० २ फुकड, आ० १२ मुगुण ।
    ५. आ० ६ सुमाणस, आ० १२ सुमाणसा ।
    ६ आ० २ जिण कहई, आ० ६ तुम्हे संपस्यो, आ० १२ सो ।
    -प्यो रास ।
    ७. आ० २ अस्त्री चरित, आ० १२ सतीय चरित ।
    ८. आ० २ गति ।
    ६. आ० २ फो, आ० १२ लपलहै ।
    १०. आ० २ आखर ।
    ११ आ० २ रस सरइ ।
    यह छंद आ० ६ में ५, आ० २ में ३, आ० ६ में ४, आ० १२
    म ५ है । किंतु आ० २ में और आ० ६ में ४ थी पंक्ति इस
    प्रकार है:—