बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 302, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें- १६६ -
किसानी है । कहीं-कहीं पंवारों में लोग शव को उलटा रख कर शवदाह करते
हैं । इनके पूर्व वैभव का एक सोरठा प्रसिद्ध है:—
पृथ्वो बडा पयार, पृथ्वी पंवारातणी ।
एक उजेणी धार, दूजो आवू नैठणूं ॥
चौहान
पंवार की तरह चोहान भी उन चार अग्निकुल वंशीय राजपूतों में से एक
है, जिनकी उत्पत्ति आवू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानी जाती
है । कर्नल टाड के मतानुसार राजपूत जाति की समस्त शाखाओं में से ये वीरता
में सर्वश्रेष्ठ हैं । पंवर वंश के पश्चात् कुछ काल तक दिल्ली पर इन्हीं का शासन
रहा । मारवाड में भी अनेक स्थानों पर इनका अधिकार था और ये उन
स्थानों के शासक रह चुके हैं । बीसलदेव रासो के अध्ययन से पता चलता
है कि ११ वीं शताब्दी में अजमेर के शासक चोहान वंशीय राजा ही थे । आज
भी मारवाड के विभिन्न भागो में ये अपनी वीरता की सेवाओं के उपलक्ष्य में
प्राप्त भूभाग को लिये हुए बसे हुए हैं ।
चौहान वंश से जिन शाखाओं का विकास हुआ है, उनमें मुख्य और महत्व-
पूर्ण 'देवडा', 'हाडा', 'सोनगरा', 'निवाणपुर्विया' और 'सांचोरा' हैं । इन विभिन्न
शाखाओं के अतिरिक्त एक शाखा मुसलमान चौहाना की भी है, जो सन् १३८३
ई० में फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में मुसलमान हो गये थे । इस शाखा
के चोहान 'कायमखानी' नाम से प्रसिद्ध हैं ।
चौहान वंश की कुलदेवी शाकंभरी माता हैं । इस वंश के राजपूतों में
'गोगा जी' का नाम बहुत प्रसिद्ध है । ये लोग उनके नाम का एक धागा
धारण करते हैं और विश्वास करते हैं कि यह धागा साँप के काटे व्यक्ति को
स्वस्थ करने में समर्थ है । भाद्र सुदी ६ को ये लोग 'गागानवमी' नामक उत्सव
मनाते हैं । ये गोगाजी कान थे कहा नहीं जा सकता । लेकिन इनकी मान्यता
और प्रसिद्धि को देखते हुए ज्ञात होता है कि ये अवश्य कोई सिद्ध पुरुष,
इनके वंश में हुए होंगे । 'कायमखानी' भी गोगा जी को गोगापीर के नाम से
पूजते हैं । पश्चिमी प्रान्तो के निवासी चौहानों में उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति
को पुत्रों एव विधवा स्त्रियो में बाँटने की प्रथा है । इसी वंश ने सर्व प्रथम
'नाता प्रथा' का प्रचलन किया और 'नातरायत' के नाम से नवीन समुदाय की
नींव डाली । जालोर के राजा कानडदेव ही वे प्रथम राजा थे, जिन्होने अपनी
विधवा पुत्री का पुनर्विवाह चित्तौड के राणा के साथ कर 'नाता प्रथा' को
आरम्भ किया था ।