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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 315 में से

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पृष्ठ 294
  • १६१ -
    जोधपुर के महाराज-गण केवल रायल्टी तथा कुछ वार्षिक रुपये पाने के अधि-
    कारी रह गए ।
    केदारनाथ
    केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय पर्वत पर स्थित है । यह अति शीतल
    स्थान है । हिम का साम्राज्य वर्ष के प्रत्येक माह में रहता है । इसकी ऊँचाई
    २२८३५ फुट है । यहाँ श्री केदारनाथ जी का अति प्राचीन मन्दिर है । ऐसा
    कहा जाता है कि यह मन्दिर पाण्डवों के समय का बना हुआ है । यहाँ की भूमि
    जलमयी है । यह मन्दाकिनी गंगा का उद्गम स्थान है । पवित्र स्थान के एक ओर
    मन्दाकिनी और दूसरी ओर सरस्वती नदी है जो हिमालय से निकलती है । इस
    प्राचीन मन्दिर की मरम्मत कुछ काल पूर्व महाराज नेपाल ओर ग्वालियर ने
    करवाई थी जिसके कारण अभी तक मन्दिर सुरक्षित है । मन्दिर के द्वार पर
    द्वारपाल खड़े हैं और दीवार पर चारों तरफ पाँचों पाण्डव, द्रोपदी, कुन्ती, पार्वती,
    लक्ष्मी आदि की मूर्तियों बनी हुई हैं । मन्दिर में जाते ही पहले दालान में इसके
    दाहिनी ओर लक्ष्मण और जानकी जी सहित भगवान् रामचन्द्र जी के दर्शन
    होते हैं । बीच में नन्दी ओर गरुड जी हैं । मन्दिर के भीतरी भाग में एक ओर
    पार्वती जी दूसरी ओर लक्ष्मी जी मूर्तियां हैं । मन्दिर के अन्दर भगवान् शंकर
    के पीठ भाग का दर्शन होता है । मूर्त्ति लिंग सदृश नहीं है । किन्तु एक टीले के
    समान है । लोगों का विश्वास है कि भगवान थक कर यहाँ विश्राम के हेतु
    लेट गये थे । मूर्त्ति इतनी बड़ी है कि दर्शनार्थियों को खड़े होकर घृत का स्नान
    कराना पड़ता है । मन्दिर का भीतरी भाग अँधेरा है और रातदिन घी का
    दीपक जला करता है ।
    महाभारत के अध्याय ८३ के ७२ वें श्लोक में केदारनाथ का उल्लेख
    मिलता है ।
    वाराणसी
    वाराणसी भारतवर्ष में हिन्दुओं के तीर्थ स्थानों में से एक पवित्र तीर्थ
    स्थान माना जाता है । पाणिनी की अष्टाध्यायी, पतंजलि के महाभाष्य, भागवत
    पुराण, स्कन्द पुराण तथा योगिनीतन्त्र में इस पवित्र स्थान का उल्लेख मिलता
    है । कूर्म पुराण के अनुसार यह नगर प्रयाग से ८० मील नीचे गंगा के उत्तरी
    किनारे पर वरणा और असी नदियों के बीच बसा हुआ है । चूंकि यह नगर
    वरणा और असी नदियों के बीच है इसलिये इस नगर का नाम वाराणसी है ।