बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ें- १५४ -
कपट¹ भूपत भोगिनउ² मवि³ कहइ वात ।
वणिजपइ⁴ भ्रंहसि मुव⁵ पहीय मइ घेवर⁶ भाव⁷ ॥
दूध घटाई पाइसुं ।
बापू गयउ घणीय निपात ॥
मुपठउ जीमे धीरा जोगीया ।
दिवइ हमि हांब कहत म्हारा पीयकी⁹ यात ॥२२६॥
यह छंद अ० २ खंड ३ में २८, आ० ६ खंड ३ में २६,
१२ में २२१ है। लेकिन आ० १२ में छठी और सातवीं
पंक्तियाँ हैं :—
६. "सरेतीय खेलै थी भाल ।"
७. "विसहर भिय गारुडी ।"
१. आ० १२ (में नहीं है) ।
२. आ० १२ भूषेत्रोगनउ ।
३. आ० १२ न ।
४. आ० १२ (में नहीं है) ।
५. आ० ६ रउ, आ० १२ को ।
६. आ० ९ घी अह, आ० १२ घणीय ।
७. आ० १२ यात ।
८. आ० १२ म्हारा ।
९. आ० ६ पीयणी, आ० १२ पीउकी ।
यह छंद अ० २ खंड ३ में ८१, आ० ६ खंड ३ में ७६,
आ० ६ में २४८, आ० १२ में २२१ है। लेकिन आ० ६ में इसकी
पाँचवीं पंक्ति नहीं है तथा अ० २ और आ० ६ में इसका पाठ है :—
"जोगी था कीतु कहइ हो बात ।
दुषइन्निझावऊँ (आ० ६ तझवटजै) यणी निवात ।
भैंस को दद्दीपर गरड़ा को (मैं सीसी-आ० ६) मात ।
यूस्ती (सास्ती-आ० ६) औ मे धीरा जोगिया ।
पद भिपि आगणि (अंगी-आ० ६) धाताइ छइ बाइ ।